वर्ष 2011 में हुई जनगणना के आधार पर अनुमान लगाया गया था कि हर रोज लगभग 2500 किसान खेती छोड़ रहे हैं। देश के किसान परिवारों की औसत आय 20 हजार रुपये वार्षिक है। कृषि को अपना मुख्य पेशा बताने वालों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। किसान पुश्तैनी कामकाज छोड़कर शहरों में नौकरी या मजदूरी की तलाश में अपनी जमीन छोड़ रहे हैं।
किसान नेताओं के मुताबिक खेती को जानबूझकर इतना घाटे का सौदा बनाया जा रहा है, जिससे किसान खेती छोड़कर शहरों में मजदूर बने और सस्ते श्रम की मांग पूरी करें, जबकि कृषि को बड़े पूंजीपतियों के लिए कांट्रैक्ट फार्मिंग के लिए छोड़ा जा रहा है।
ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्यवय समिति के सदस्य सुनीलम कहते हैं कि मध्यप्रदेश जैसे राज्य में खेती किसानों की आय का पहला स्रोत नहीं रह गई है। अब किसान घरों के युवा मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों में जाकर मजदूरी कर रहे हैं और उन्हीं की अतिरिक्त आय से घर का खर्च चल रहा है। खेती से किसान का पेट तो भर जाता है, लेकिन उसका खर्च नहीं चल रहा है। अगर किसान परिवार को कोई काम करना हो तो उसके लिए अपनी जमीन बेचने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता।
यूपी-बिहार, राजस्थान के करोड़ों किसानों के लिए कृषि अब उनकी प्राथमिकता सूची में पहले नंबर पर नहीं रह गई है। ज्यादातर लोगों ने खेती को बंटाई पर या ठेके पर अपने करीबियों को सौंप दिया है और स्वयं किसी शहर में जाकर नौकरी करने लगे हैं। यह भी कृषि से पलायन का एक रूप है। सुनीलम कहते हैं कि किसान परिवारों को यह स्पष्ट हो गया है कि खेती अब उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी नहीं है। यही कारण है कि लोग किसी न किसी तरीके से खेती से दूरी बना रहे हैें।
शहरों में गरीब प्रवासी मजदूरों में सबसे बड़ा वर्ग यही गरीब किसान या कृषि भूमि रहित मजदूर है। सुनीलम कहते हैं कि सरकार इन्हें स्थाई रोजगार देना चाहती है, तो उन्हें इनकी जमीन पर ही खेती के साथ-साथ अन्य उपयोगी रोजगार के माध्यम उपलब्ध कराना चाहिए। लेकिन वर्तमान नीति में ऐसी दिशा का सर्वथा अभाव दिखाई पड़ रहा है।
महाराष्ट्र की किसान नेता प्रतिभा शिंदे ने बताया कि दक्षिणी भारत के राज्यों में किसान खेती से पलायन तो नहीं कर रहे हैं, लेकिन यह उनके लिए भारी घाटे का सौदा बन चुकी है। यही कारण है कि किसान अब गैर-कृषि कार्यों में ज्यादा संभावनाएं तलाश रहे हैं। लेकिन गैर कृषि कार्य सभी युवाओं को रोजगार देने में नाकाबिल साबित हो रहे हैं। यही कारण है कि अब दक्षिणी राज्यों में भी बेकारी तेजी से बढ़ रही है। अगर सरकार खेती को लाभकारी बनाने की दिशा में काम करती तो इस क्षेत्र से सबसे ज्यादा युवाओं को नौकरी दी जा सकती थी।