केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने अगले डेढ़ साल तक तीनों कृषि कानूनों को निलंबित रखने का प्रस्ताव जरूर दिया है, लेकिन किसान संगठन केन्द्र सरकार पर ऐतबार नहीं कर पा रहे हैं। किसान संगठन आज दो बंजे सिंघु बॉर्डर पर मैराथन बैठक कर आंदोलन के भविष्य, सरकार के प्रस्ताव और अपनी मांगों पर एकजुटता बनाने की रणनीति पर निर्णय लेंगे। फिलहाल किसानों की मंशा केन्द्र सरकार के मीठे जाल में फंसने की नहीं है। उनका कहना है कि सरकार की मंशा ठीक नहीं है। वह कभी हमें राष्ट्र विरोधी, कभी खालिस्तानी और कभी कुछ बताती है। कभी हमारे आंदोलन को बड़े किसानों का आंदोलन बताती है। इसलिए इस बार हम अंतिम निर्णय लेकर ही जाएंगे।
किसान नेता चौधरी हरपाल सिंह का कहना है कि केंद्र सरकार दिल्ली की सीमा पर डटे और देश के दूसरे हिस्सों से कूच कर चुके लाखों किसानों को किसी तरह से एक बार उनके खलिहान की तरफ भेजने की रणनीति पर काम कर रही है। चौधरी हरपाल सिंह का कहना है कि केंद्र सरकार की नियत साफ नहीं है। वह तो शुरू से आंदोलन को बदनाम कर रही है। दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलनरत हमारे 125 किसान शहीद हो गए और केंद्र सरकार, उनके मंत्रियों के मुंह से श्रद्धांजलि के शब्द तक नहीं निकले।
अभी तक केन्द्र सरकार कह रही थी कि वह तीनों कानूनों को रद्द नहीं करेगी, बरगलाने के लिए एमएसपी पर खरीद का जुमला छोड़ रही थी, कृषि मंत्री कह रहे थे कि वह एक दिन के लिए भी तीनों कानूनों को निलंबित नहीं रख सकते। फिर अचानक कैसे डेढ़ साल के लिए निलंबित रखने के लिए तैयार हो रहे हैं? इससे तो अच्छा है कि सरकार जिद छोड़े, कानूनों को रद्द करे और नए सिरे से कानून लाने के लिए मिलकर होमवर्क करे। हरपाल सिंह का कहना है कि किसान संगठन केन्द्र सरकार की हर नियत को भांपने, समझने में सक्षम हैं।
हरमीत सिंह कादियान और चौधरी हरपाल सिंह का कहना है कि किसान एमएसपी पर खरीद की गारंटी और तीनों काले कानूनों को वापस लेने की मांग के साथ दिल्ली की सीमा पर आ डटे हैं। उनकी दोनों मांगें अभी भी बनी हुई हैं। सरकार ने इस पर कोई फैसला नहीं लिया है। केन्द्र सरकार ने इससे पहले भी कहा था कि वह स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करेगी, लेकिन कहां लागू किया? हरपाल सिंह कहते हैं कि यह कोई बाबा रामदेव का आंदोलन नहीं है, जिसे केन्द्र सरकार डंडे के बल पर भगा देगी। हम किसान हैं, शांतिपूर्ण तरीके से अपना प्रदर्शन कर रहे हैं। लाखों की संख्या में हैं, सौ से अधिक किसान प्रदर्शन करते हुए शहीद हो गए, लेकिन किसी को एक खरोंच भी नहीं आई। हम इसी शिद्दत से अपनी मांग को लेकर डटे रहेंगे।
गुरनाम सिंह चढ़ूनी पंजाब के किसान नेताओं के साथ बैठक में व्यस्त थे। लिहाजा बात नहीं हो पाई। किसान नेता हनन मुल्ला को भी सरकार के प्रस्ताव पर भरोसा नहीं है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश से हजारों किसानों ने ट्रैक्टरों के साथ दिल्ली की तरफ कूच करना शुरू कर दिया है। देश की खुफिया एजेंसी भी काफी सतर्कता बरत रही है। पंजाब से ही 10-15 हजार ट्रैक्टरों के रवाना होने की सूचना आ रही है।
किसान इसे अपने लिए बड़ी चुनौती मान रहे हैं। किसान संगठन से जुड़े एक बड़े नेता का कहना है कि पंजाब से चलकर दिल्ली आने में कितने पापड़ बेलने पड़े, कितनी बार पानी की बौछारें और हरियाणा सरकार के जुल्म सहने पड़े, हम जानते हैं। लाखों की संख्या में किसानों के साथ सिंघु, टिकरी, गाजीपुर बार्डर पर आना, 56 दिन कड़ाके की ठंड, बारिश, शीत लहर को झेलना, संसाधन खड़ा करना आसान नहीं है। इसलिए एक बार जब किसान बिना मांग पूरी हुए खलिहान की तरफ लौट गया, तो अगले दस साल तक अपनी मांगों को लेकर इतना बड़ा आंदोलन करने की जहमत नहीं उठाई जा सकेगी।
होशियारपुर, मोंगा और गुरुदासपुर से आए युवा किसान की टोली का भी यही मानना है। बीटेक, एमबीए और बीबीए कर चुके युवा अपने चाचा, ताऊ, दादा के साथ आंदोलन में शामिल हैं। उनका कहना है कि सरकार तीनों कानून में संशोधन करने को तैयार है, डेढ़ साल के लिए इन्हें निलंबित करने के लिए तैयार है तो आखिर रद्द नहीं करने की जिद क्यों पकड़कर बैठ गई है।