किसान आंदोलन रविवार को लगातार 11वें दिन भी जारी है। सरकार से विफल वार्ता और कड़कड़ाती ठंड के बावजूद हजारों की संख्या में किसान दिल्ली एनसीआर की सीमा पर डटे हुए हैं। शनिवार को सरकार और किसानों के बीच वार्ता बेनजीता रही। ऐसे में किसानों ने आठ दिसंबर को भारत बंद बुलाया है। इसी बीच कांग्रेस और तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (टीआरएस) ने इस बंद को अपना समर्थन देने का एलान किया है।
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने रविवार को कहा, 'कांग्रेस ने आठ दिसंबर को भारत बंद का समर्थन करने का फैसला किया है। हम अपने पार्टी कार्यालयों पर भी प्रदर्शन करेंगे। यह किसानों के समर्थन में राहुल गांधी की तरफ से बढ़ाया गया मजबूत कदम होगा। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि प्रदर्शन सफल हो।'
पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा, 'मैं यहां घोषणा करना चाहता हूं कि कांग्रेस आठ दिसंबर को होने वाले भारत बंद को पूरा समर्थन देती है। उन्होंने कहा कि पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ट्रैक्टर रैलियों, हस्ताक्षर अभियानों और किसान रैलियों के जरिए किसानों के पक्ष में पार्टी की आवाज बुलंद कर रहे हैं।
खेड़ा ने कहा, 'हमारे सभी जिला मुख्यालय एवं प्रदेश मुख्यालयों के कार्यकर्ता इस बंद में हिस्सा लेंगे। वे प्रदर्शन करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि बंद सफल रहे। सारी दुनिया हमारे किसानों की दयनीय अवस्था देख रही है। पूरा विश्व यह भयावह मंजर देख रहा है कि किसान जाड़े की रातों में राजधानी के बाहर बैठे इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि सरकार उनकी बात सुन ले।'
किसानों को मिला टीआरएस का समर्थन
किसानों के भारत बंद आंदोलन को लेकर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने बयान दिया है। उन्होंने कहा कि आठ दिसंबर को होने वाले भारत बंद में टीआरएस किसानों के समर्थन में खड़ी रहेगी।
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हमने संसद में भी किया था विधेयक का विरोध: के कविता
टीआरएस की एमएलसी के कविता ने कहा, 'हमने संसद में विधेयकों का विरोध किया था, हम ऐसा करना जारी रखेंगे। इनमें से किसी भी बिल में एमएसपी का आश्वासन नहीं दिया गया है। इसके अलावा, अगर मंडी संरचना को ध्वस्त किया जाता है, तो इस देश में कोई वैकल्पिक संरचना मौजूद नहीं है, इसलिए किसान असुरक्षित है। टीआरएस किसानों द्वारा बुलाए गए बंद का समर्थन करेगा।'
वहीं कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने किसान नेताओं और केंद्र सरकार के बीच दूसरे दौर की बातचीत को लेकर कहा था कि कृषि संबंधी ‘काले कानूनों’ को पूरी तरह से रद्द करने से कम कुछ भी स्वीकार करना किसानों के साथ विश्वासघात होगा। उन्होंने ट्वीट कर कहा था, 'काले कृषि कानूनों को पूर्ण रूप से रद्द करने से कम कुछ भी स्वीकार करना भारत और उसके किसानों के साथ विश्वासघात होगा।'