किसान महापंचायत में राकेश टिकैत
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पिछले 100 दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलन कर रहे किसानों ने चुनावी राज्यों में भाजपा के विरोध का निर्णय किया है। तय रणनीति के अनुसार सभी पांच चुनावी राज्यों में किसानों के हर घर पर एक पत्र भेजकर उनसे भाजपा को वोट न देने की अपील की जाएगी। लेकिन किसान नेता उन्हें किसी राजनीतिक दल विशेष को वोट देने की अपील भी नहीं करेंगे। किसानों से कहा जायेगा कि वे भाजपा को छोड़कर बाकी किसी भी दल को वोट करें। यह अभियान 12 मार्च से शुरू होकर चुनाव के अंतिम चरण तक चलेगा।
भाजपा के विरोध की इस रणनीति का सबसे ज्यादा असर पश्चिम बंगाल और असम में दिखाई पड़ सकता है। पश्चिम बंगाल में सभी 294 विधानसभा सीटों पर इसका असर दिखाई पड़ेगा। इस अभियान की शुरुआत 12 मार्च को एक जुलूस निकालकर और अंत में एक जनसभा करके की जाएगी। 13 मार्च को कोलकाता में किसानों की एक बड़ी जनसभा आयोजित करने की रणनीति भी बनाई गई है।
तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी इस बार अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर की बजाय नंदीग्राम से चुनाव लड़ेंगी। किसान नेता 13 मार्च को नंदीग्राम में बड़ी जनसभा करेंगे। 14 मार्च को सिंगूर में विशाल जनसभा का आयोजन किया जायेगा।
पत्र भेजने का कार्यक्रम 'रिले' के रूप में आयोजित किया जाएगा। यानी एक किसान पत्र लेकर उसे अगले गांव के किसानों को पहुंचाएगा। उसके अगले दिन दूसरे गांव का किसान उन्हीं पत्रों को अगले गांव तक पहुंचाएगा। इन पत्रवाहक लोगों को 'किसान दूत' का नाम दिया जायेगा।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार असम में 15 मार्च को एक बड़ी जनसभा की जा सकती है। तमिलनाडु में भाजपा अब तक एक बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं बन सकी है। लिहाजा तमिलनाडु में किसानों की रणनीति उस दल के पक्ष में वोट करने से रोकने की रहेगी जो चुनाव बाद भाजपा का साथ दे सकता है। केरल और पुडुचेरी में भी किसान अपना विरोध दिखाएंगे।