'किसान आंदोलन' की 'दशा और दिशा' को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। आंदोलन से जुड़े नेता क्या अब सियासत के मैदान में उतरने का मन बना रहे हैं, राजनीति की किस करवट बैठेगा 'किसान आंदोलन' का ऊंट और चुनावी राज्यों में किसान नेताओं का प्रचार, यह किसे फायदा पहुंचाएगा, इन चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है। किसान आंदोलन में शामिल कई नेता पहले भी राजनीतिक अखाड़े में दो-दो हाथ कर चुके हैं। जिस तेजी से राकेश टिकैत, राजनीतिक लोगों के साथ नजदीकियां बढ़ा रहे हैं, उसके मद्देनजर कुछ भी संभव है।
राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीएम सिंह कहते हैं, 26 जनवरी से पहले तक इस आंदोलन में 'किसान' की बात हो रही थी, मगर उसके बाद किसान संगठनों के पदाधिकारियों में 'नेता' बनने की होड़ लग गई। अखिल भारतीय आदर्श जाट महासभा के अध्यक्ष दीपक राठी के मुताबिक राकेश टिकैत की टोली तैयार हो रही है। इसमें हुड्डा, चौटाला और अजीत सिंह जैसे कई नेता शामिल हो सकते हैं। योगेंद्र यादव कहते हैं, भाजपा को सिर्फ एक ही भाषा समझ आती है, वोट, सीट और चुनाव की भाषा। अब उसी भाषा में बात होगी।
संयुक्त किसान मोर्चे ने पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी के वोटरों के बीच जाने का निर्णय लिया है। राकेश टिकैत तो पहले ही कई राज्यों में महापंचायत कर चुके हैं। मोर्चे के नेताओं से जब पूछा गया कि वे राजनीति के मैदान में उतर रहे हैं तो उन्होंने कहा, हम चुनावी राज्यों में जा रहे हैं। वहां के लोगों से अपील करेंगे कि वे किसान विरोधी कानून बनाने के लिए भाजपा को दंडित करें यानी इस पार्टी के पक्ष में वोट न दें।
अखिल भारतीय आदर्श जाट महासभा के अध्यक्ष दीपक राठी कहते हैं, राकेश टिकैत पर उन्हें शुरू से ही शक है। वे सियासत में कूदना चाहते हैं। इसके लिए वे किसान आंदोलन को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। हमारे पास ऐसी सूचनाएं हैं कि टिकैत, हुड्डा, चौटाला और अजित सिंह जैसे कई दूसरे नेता जो अपने लिए मजबूत राजनीतिक प्लेटफार्म तलाश रहे हैं, वे एक साथ किसी मंच पर आ सकते हैं। बतौर राठी, इस बाबत दिल्ली में बैठक भी हुई है। बता दें कि पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा 2019 में कांग्रेस हाईकमान को आंख दिखा चुके हैं। पार्टी भी उनसे छुटकारा चाहती है। लिहाजा अभी तक हुड्डा का हरियाणा में बड़ा कद है, उनके साथ अधिकांश विधायक हैं, इसलिए पार्टी एकाएक कोई निर्णय नहीं ले पा रही है।
राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीएम सिंह, जिन्होंने 26 जनवरी को हुए लालकिला उपद्रव के बाद खुद को किसान आंदोलन से अलग कर लिया था, बताते हैं, कई किसान नेता तो दिखावे के लिए भाजपा की खिलाफत कर रहे हैं। अब किसान का मसला पीछे चला गया है। नेता बनने की होड़ लगी है, देखना सिर्फ ये है कि कौन कहां फिट हो सकता है। पहले तो किसानों को दिल्ली के बाहर बैठा दिया, बाद में इनके नेता खुद वहां से निकल लिए। नतीजा, आज धरना स्थल पर सैकड़ों किसान भी नहीं जुट पा रहे।
दिल्ली आने से पहले अधिकांश किसान नेता किसी न किसी पार्टी के साथ जुड़े रहे हैं। इन्हें कानून समझने में ही छह माह लग गए। अब अगले छह माह में ये नेता कुछ और समझने लग गए तो बेचारा किसान क्या करेगा, कहां जाएगा। उत्तर प्रदेश में सभी किसान रोजाना पीएम मोदी को संदेश भेजते हैं। वे अनशन भी करते हैं और तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ अपना विरोध भी दर्ज कराते रहते हैं। हमारा प्रयास है कि किसान का मुद्दा पीछे न छूटने पाए। उसे मजबूत बनाना हमारी पहली प्राथमिकता है।
बतौर वीएम सिंह, संयुक्त किसान मोर्चा कह रहा है कि हम पांचों चुनावी राज्यों में जाएंगे। वहां भाजपा की मुखालफत करेंगे। पश्चिम बंगाल में किसान नेता किसे फायदा पहुंचाने जा रहे हैं। पंजाब के किसान संगठनों की 29 में से 26 जत्थेबंदी तो वामपंथी हैं। बाकी बचे योगेंद्र यादव और हन्नान मौला सहित कई दूसरे वामपंथी नेताओं को कौन नहीं जानता। करीब 35 संगठन वामपंथी हैं। अगर ये वामपंथी, बंगाल चुनाव में जा रहे हैं तो उसका फायदा भाजपा को होगा और नुकसान ममता बनर्जी के खाते में जाएगा। अगर वहां के लोगों ने इनकी बात सुनकर लेफ्ट या कांग्रेस को वोट डाला तो उसका नुकसान ममता बनर्जी को होगा और फायदा भाजपा को पहुंचेगा। किसान नेता पहले ही कह चुके हैं कि वे केवल लोगों से यह अपील करेंगे कि वे भाजपा को दंड दें। यह नहीं कहेंगे कि वे किस पार्टी को वोट दें।
यह तय है कि इन लोगों ने अगर नई पार्टी बनाई तो ये ढेर हो जाएंगे। ऐसी संभावना है कि अधिकांश नेता बड़ी पार्टियों में पिछले दरवाजे से एंट्री कर जाएं। वीएम सिंह के मुताबिक, हरियाणा में टिकैत की पहली महापंचायत किसने कराई थी, क्या इसके पीछे भाजपा नेताओं का सहयोग रहा है। इसके बाद भारतीय किसान यूनियन के हरपाल सिंह बेलारी ने नरेश टिकैत की जनसभा कराई। वहां तो सपा का विधायक भी मौजूद था। जनसभा के पीछे असल में किसका हाथ था, लोग जानते हैं।
उत्तराखंड में पूर्व सीएम हरीश रावत ने महापंचायत कराई, कोई इससे इनकार कर सकता है। रतलाम में पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने महापंचायत कराई और कहा, वे मंच पर नहीं, नीचे बैठेंगे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और राकेश टिकैत के बीच पकती रही खिचड़ी का स्वाद बहुत से लोग जानते हैं। अब बंगाल में किसान नेताओं की बैठक कौन कराएगा, ममता बनर्जी या वामपंथी पार्टियां, ये देखने वाली बात होगी।