किसान आंदोलन को लेकर अब राजनीति की बातें की जाने लगी हैं। इस सवाल के जवाब में अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के वरिष्ठ सदस्य अविक साहा कहते हैं, किसानों को किसी की निगरानी में आंदोलन नहीं करना है। जो डरा हुआ है, वही राजनीति कर रहा है।
अब आप खुद अंदाजा लगा लें कि इस आंदोलन से कौन भयभीत है। राजनीति करने का आरोप लगाने वाले लोग इतना ज्यादा डर गए हैं कि वे अब किसानों के पहचान पत्रों की जांच कराने लगे हैं। प्रदर्शन स्थल पर किसानों से उनके पहचान पत्र दिखाने के लिए कहा जा रहा है। बतौर अविक, उन लोगों को पंजाब में राजनीति नहीं नजर आई, लेकिन किसान जैसे ही हरियाणा और दिल्ली की तरफ आए, तो वे कहने लगे कि राजनीति हो रही है। किसान आज भी राजनीति से कोसों दूर हैं। उनकी मांग पूरी होते ही वे वापस लौट जाएंगे।
पिछले दो दिनों से किसानों के आंदोलन को लेकर राजनीति की खबरें जोर पकड़ती जा रही हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर कहते हैं कि उन्होंने किसानों के मुद्दे पर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अरमेंद्र सिंह से बात करने के लिए कई बार फोन मिलाया, लेकिन जवाब नहीं मिला। मुख्यमंत्री खट्टर की तरफ से ही सबसे पहले किसान आंदोलन को लेकर एक गंभीर टिप्पणी की गई थी। उन्होंने कहा था कि वे बाद में इसका खुलासा करेंगे। रविवार को आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने कहा कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह किसानों से बात करने के लिए शर्त रख रहे हैं।
चड्ढा ने कैप्टन को बताया, भाजपा का मुख्यमंत्री
दूसरी तरफ आप विधायक राघव चड्ढा कहते हैं कि कांग्रेस शासित पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह तो वास्तव में भाजपा के मुख्यमंत्री हैं। किसान आंदोलनों को कुचलने में कैप्टन अमरेंद्र भी भाजपा के साथ जिम्मेदार हैं। चड्ढा ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी और कैप्टन अमरेंद्र के बीच सांठगांठ और दोस्ती है। इसी वजह से किसानों को ठगा जा रहा है। दोनों नेताओं के बीच रोजाना फोन पर बातचीत होती है। गृहमंत्री अमित शाह जोकि हैदराबाद के दौरे पर हैं, वहां पर उन्होंने किसानों के विरोध को लेकर अपनी बात रखी। शाह ने साफ कहा कि मैंने कभी भी किसानों के विरोध को राजनीति से प्रेरित नहीं कहा, न ही मैं अब कह रहा हूं।
अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के वरिष्ठ सदस्य अविक साहा बताते हैं कि पंजाब में दो माह से आंदोलन चल रहा था। वहां भाजपा का प्रभावी संगठन है, लेकिन भाजपा ने कभी नहीं कहा कि किसान आंदोलन को लेकर राजनीति हो रही है। जैसे ही वहां के किसान दिल्ली का रुख करते हैं, तो वह पार्टी राजनीति की बात करने लगती है। हरियाणा में सड़कें खोद दी जाती हैं। जैसे ही किसान भाजपा शासित राज्य या केंद्र सरकार के करीब पहुंचते हैं, तो उनका आंदोलन राजनीतिक होने लगता है। ये बड़ी विचित्र स्थिति है। भाजपा और आरएसएस की भी अपनी किसान विंग है। क्या वो राजनीति से परे रहते हैं। दरअसल, भाजपा ने अविश्वास का माहौल पैदा कर दिया है।
किसानों ने जगह देने का आग्रह किया, लेकिन मंजूरी नहीं मिली
अविक ने बताया कि किसान संगठनों ने दिल्ली पुलिस को दो नवंबर को पत्र भेजकर जगह देने का आग्रह किया था, लेकिन इजाजत नहीं मिली। इसके बाद चार नवंबर को दोबारा से आग्रह किया, तो भी मंजूरी नहीं मिल सकी। दिल्ली पुलिस ने मंजूरी न देने के पीछे कोविड का हवाला दिया। देश में चुनाव हो रहे हैं, लेकिन वहां कोविड का डर नहीं था। अब किसान दिल्ली आ रहे हैं तो कोविड का डर सताने लगा।
साहा कहा कि केंद्र सरकार ने भरोसा तोड़ दिया है। अतीत में भी अविश्वास ही रहा है। किसान नहीं जानते कि ये सरकार कैसे वादे करती है। दो करोड़ रोजगार, किसानों के लिए फसल बीमा और फसलों का दोगुणा दाम, आज इनकी स्थिति किसी से भी पूछ लें। फसल बीमा ने तो किसानों की कमर तोड़ दी है। केंद्र सरकार ने तीन बिल पास करा दिए, लेकिन किसानों से पूछा तक नहीं। ऐसे में किसान क्यों और किसलिए भरोसा करेंगे। अब सरकार ने किसानों के आंदोलन को दबाने की हर संभव कोशिश की है, लेकिन वह अपने इरादों में सफल नहीं हो पाई। किसान ने उन्हें जब चित कर दिया, तब जाकर उनके होश ठिकाने आए। अब सरकार को तुरंत प्रभाव से किसानों के पास आकर बातचीत करनी चाहिए। वह भी बिना कोई शर्त लगाए।