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किसान असंतोष बनी भाजपा की नई चुनौती

Sat, 03 Jun 2017 08:38 PM IST
संजय मिश्र
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भाजपा शासित राज्यों मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के किसान आंदोलनों ने पार्टी आलाकमान के लिए नई चुनौती पैदा कर दी है। एक ओर केंद्र सरकार के तीन वर्ष पूरे होने के अवसर पर पीएम मोदी की गांव, गरीब और किसान हितैषी छवि को लेकर पार्टी अपने प्रसार में जुटी है। तो दूसरी ओर मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सरीखे पार्टी शासित राज्यों में हो रहे किसान आंदोलनों ने विपक्ष को बैठे बिठाए सियासी औजार प्रदान कर दिया है। वह भी ऐसे समय में जब पीएम मोदी दुनिया के सामने भारत का परचम लहराने की कवायद में जर्मनी, स्पेन,रूस और फ्रांस सरीखे चार देशों की विदेश यात्रा पर हैं। हालांकि पार्टी आलाकमान ने सक्रियता दिखाते हुए दोनों ही राज्यों के मुख्यमंत्रियों को किसानों की समस्या का समाधान जल्द निकालने को कहा है। 
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मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र दोनों की समस्या एक समान 
भाजपा आलाकमान के लिए चुनौती इसलिए भी है कि मध्य प्रदेश हों या महाराष्ट्र दोनों ही राज्यों के किसान कर्ज माफी के साथ अपने उत्पाद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग कर रहे हैं। यूपी में योगी आदित्य नाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बाद प्रदेश में किसानों के कर्ज माफ कर दिए गए हैं। इस तरह की मांग देश के अन्य राज्यों से भी उठने लगी है।

चंद दिनों पहले ही तमिलनाडू के किसान भी कर्ज माफी और किसानों की दुर्दशा के मुद्दे को लेकर देश की राजधानी दिल्ली में अपना सफल विरोध जता चूके हैं। हालांकि भाजपा और संघ से जुडे संगठन भी किसानों की मांग को वाजिब मान रही हैं। मगर पार्टी का कहना है कि व्यवस्था सुधरने में लंबा वक्त लगेगा। जबकि विभिन्न किसान संगठनों से जुडे नेताओं का कहना है कि कृषि क्षेत्र के मामले में किसानों का मोदी सरकार से मोह भंग हो रहा है। 
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मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में किसानों का क्यों बरपा है हंगामा

महाराष्ट्र किसानों का आंदोलन - फोटो : ANI
कृषि विकास के मामले में लगातार राष्ट्रीय अवार्ड बटोर रहे मध्य प्रदेश में किसानों का आंदोलन भाजपा के लिए दयनिय हालात पैदा कर रहा है। पीएम मोदी से लेकर पूरा भाजपा नेतृत्व शिवराज के कृषि मॉडल की देश—दुनिया में सराहना करता रहा है। मगर अब वहीं का किसान वाजिब दाम और कर्ज माफी की मांग को लेकर सरकार के सामने है। यहां किसानों को प्याज और सब्जियों के उचित दाम नसीब नहीं हो पा रहे है। तो महाराष्ट्र का मामला भी कुछ ऐसा ही है।

चुनावी वायदों की याद दिलाते हुए किसान सूबे की सरकार से कर्ज माफी का वायदा पूरा करने की मांग के साथ सब्जि और अन्य उत्पादों के वाजिब मूल्य की मांग कर रहे हैं। किसानों का आरोप है कि दूध भी उसके लिए घाटे का सौदा बन गया है। सूबे के मुखिया देवेंद्र फडणवीश ने राजनैतिक कौशलता दिखाते हुए बेशक किसानों की हडताल खत्म करा दी है। मगर समस्या अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। यहां भाजपा की सबसे बडी मुश्किल है कि उसके अपने सहयोगी दल के सांसद राजू शेतकरी किसानों के साथ रहते हुए सरकार के विरोध में हैं। तो मध्यप्रदेश में भी किसान आंदोलन की धूरी संघ के संगठन से निकले शिव कुमार शर्मा बने हुए हैं।

खुशहाली के दो आयाम, कर्ज मुक्ति पूरा दाम
मध्य प्रदेश आंदोलन कर रहे किसानों की मुख्य मांग कर्ज मुक्ति और पूरा दाम है। राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ की अगुवाई में आंदोलन कर रहे किसानों ने नारा दिया है कि खुशहाली के दो आयाम कर्ज मुक्ति पूरा दाम। आंदोलन के नेता शिव कुमार शर्म उर्फ कक्का जी का कहना है कि लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा ने अपने घोषणापत्र में लिखा था कि सत्ता आने पर किसानों को फसल लागत मूल्य से 50 प्रतिशत ज्यादा दर पर उत्पाद का समर्थन मूल्य मिलेगा। मगर सत्ता आने के बाद पार्टी वायदे से मुकर गई है। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागु करने के मामले में भी किसानों को महज जुमला नसीब हुआ है।
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आंदोलनों ने ब्यां की किसानों की वास्तविक स्थिति

देश के जाने—माने कृषि अर्थशास्त्री देवेंद्र शर्मा का कहना है कि तमिलनाडू के बाद अब मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के किसानों का आंदोलन कृषि क्षेत्र की दयनीय अवस्था की परीणति हैं। पीएम मोदी बेशक यह बात कहते रहें कि देश के किसानों के घर में दिवाली मन रही है। मगर जमीनी सच्चाई इसके विपरित है। बीते 20 वर्षों में देश के 3 लाख 18 हजार किसानों ने आत्म हत्या कर अपनी जान गंवाई है। सही मामले में केंद्र सरकार किसानों के लिए कुछ ठोस नहीं कर पा रही है।

70 सालों से नहीं हो सकी किसानों की बाजार में भागीदारी बढाने की व्यवस्था
किसान नेता कृष्णवीर चौधरी का कहना है कि किसानों को बिचौलियों के भरोसे छोडकर उनकी समस्या का हल नहीं किया जा सकता है। दलगत राजनीति से उपर उठते हुए उन्होंने कहा कि सरकारें बदलती हैं नीति बनाने वाले नहीं बदलते। बीते 70 सालों में हम किसान को बाजार से जोडने में कामयाब नहीं रहे हैं। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के किसान आंदोलनों के पिछे विपक्ष का हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। मगर सच्चाई यह है कि किसानों को उत्पाद का वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा है। किसान कर्ज से त्रस्त है। उन इलाकों में स्थिति ज्यादा खराब है जहां कॉरपोरेट खेती को बढावा दिया जा रहा है। कृषि की दशा सुधारने के लिए एक ईमानदार पहल की जरूरत है। अब तक देश में राष्ट्रीय स्तर पर एक भूमि उपयोग विकास प्राधिकरण का गठन तक नहीं हो सका है। गांव के लाल डोरे की सीमा तय है मगर शहरों की नहीं। शहरों की भी सीमा तय होनी चाहिए।

कृषि समस्या के स्थाई समाधान के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाए सरकार
संघ के संगठन भारतीय किसान संघ का कहना है कि कृषि नीति की बुनियादी सोच में ही अंतर है। संगठन के राष्ट्रीय महासचिव बद्री नारायण चौधरी ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि किसानों की समस्या के स्थाई समाधान के लिए संसद का एक विशेष सत्र आहूत किया जाना चाहिए और देश के सभी ​राजनैतिक दलों से आह्वान है कि वे दलगत भाव से उपर उठकर किसान हित के लिए सही नीति बनाने में सहयोग करें।

लंबे समय की है समस्या,निदान में लगेगा वक्त
भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोही ने किसानों की समस्या को स्वीकार करते हुए कहा कि किसानों की मुख्य समस्या बाजार पर नियंत्रण न होने की वजह से है। बाजार सुधार की व्यवस्था जरूरी है। केंद्र सरकार ने मंडी सुधार से लेकर ई—मार्केट सरीखे कई सराहनीय प्रयास किए हैं। जमीन पर सुचारू रूप से उतरने में इसे वक्त लगेगा। किसानों की समस्या लंबे समय से चली आ रही है। लेकिन मोदी सरकार समस्याओं के समाधान की दिशा में तेजी से प्रयासरत है। किसानों को उसके उत्पाद का न्यूनतम समर्थन मूल्य हर हाल में मिलना चाहिए। यदि कहीं नहीं मिल पा रहा है तो राज्य सरकारों को सख्ती बरतनी चाहिए।
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