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किसानों पर दोहरी मार: सरकार विदेश से मंगाएगी दालें, खाद के दाम बढ़ा डाला 20 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ

Thu, 20 May 2021 01:04 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, तीन काले कानून बना खेती को बेचने की साजिश, डीजल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि, खेती पर टैक्स, किसान की कर्जमाफी के नाम पर पीठ दिखाकर भाग खड़ा होना, फसल बीमा योजना के नाम पर लूट और अब खाद की कीमतें बढ़ा 20,000 करोड़ रुपये सालाना का अतिरिक्त भार डालना साबित करता है कि भाजपा का डीएनए ही किसान विरोधी है...
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दालें - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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कोरोनाकाल में किसानों पर दोहरी मार पड़ गई है। एक तरफ केंद्र सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने दलहनों के आयात पर लगा प्रतिबंध हटा लिया है। यानी अब देश में दूसरे मुल्कों से दालें आएंगी। किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने इसे बड़े पूंजी वाले व्यापारी, शीर्ष पर बैठे अधिकारी तथा सत्ताधारी राजनेताओं के अपवित्र गठजोड़ का दुष्परिणाम करार दिया है। इसका नतीजा यह रहेगा कि दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने जा रहे देश के रास्ते में अब कई बाधाएं खड़ी हो जाएंगी।

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उनका कहना है कि स्थानीय किसान की पैदावार का क्या होगा। सरकार तो दलहन उत्पादन की एक चौथाई पैदावार पर ही एमएसपी देती है। इस फैसले से दलहन की खेती करने वाले किसान तो भारी नुकसान के नीचे आ जाएंगे। दूसरा, खाद की कीमतें बढ़ाकर किसानों पर 20,000 करोड़ सालाना का अतिरिक्त भार डाल दिया गया है। कांग्रेस पार्टी के नेता रणदीप सुरजेवाला के अनुसार, केंद्र सरकार का यह कदम साबित करता है कि भाजपा का डीएनए ही किसान विरोधी है।

दलहन उत्पादन में देश नहीं होगा आत्मनिर्भर

किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट बताते हैं, बुधवार को हुई एक बैठक में किसानों ने दलहनों के आयात से प्रतिबन्ध हटाने के विरोध में प्रस्ताव पारित किया है। इससे दलहन उत्पादन में देश आत्मनिर्भरता के रास्ते पर नहीं बढ़ सकेगा। उड़द, मूंग, अरहर के आयात से प्रतिबंध हटाने की अधिसूचना 15 मई को वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी की गई है। यह घोषणा होते ही दलहनों के दामों में गिरावट का दौर शुरू हो गया है। रामपाल के मुताबिक, यह अधिसूचना विदेश में दलहन की खेती करने वाले एवं आयात-निर्यात करने वाले धनाढ्य व्यापारियों को लाभ पहुंचाने के लिए जारी की गई है। इसमें चुनाव लड़ने वाले सत्ताधारी राजनेता व अधिकारी तंत्र (ब्यूरोक्रेसी) भी सम्मिलित है।

देश में बेहद कम दलहन के आयातक

सरकार का इस फैसले का भार उत्पादक किसानों पर पड़ेगा। इस गठजोड़ के सहभागियों को यह बात अच्छे से मालूम है कि उपभोक्ताओं के हितों की रक्षार्थ उन्हें कम दामों पर दालें उपलब्ध कराई जा सकती हैं। इससे पहले भी मूंग, चना, उड़द व अरहर आदि दालों का गरीब उपभोक्ताओं को आवंटन किया गया था। इससे उत्पादक एवं उपभोक्ता, दोनों के हित संरक्षित रह सकते हैं। उत्पादक किसानों को उनके उत्पादों का भारत सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम मूल्य दिलाना जरूरी है। इससे उनके हितों का संरक्षण हो सकेगा। साथ ही इसके परिणामस्वरूप भारत, दलहन उत्पादन में सदा ही आत्मनिर्भर बना रह सकता है। देश में सरकारी नीति के कारण मूंग, उड़द, अरहर, मसूर व चना की सरकारी खरीद कुल उत्पादन में से एक चौथाई से अधिक नहीं की जा सकती। आवश्यकता इस प्रकार के प्रतिबंध को समाप्त करने की थी, मगर सरकार ने इसके उलट आयात से ही प्रतिबंध हटा दिया। देश में दलहन के आयातकों की संख्या नगण्य है। वे कुल जनसंख्या में 0.1 फीसदी भी नहीं हैं।
 
सरकार को यह भी बताना चाहिए कि जब 2017-18 में दलहन के आयात पर प्रतिबंध लगाए गए थे और 2018 में चना एवं मटर का आयात शुल्क 70 फीसदी बढाया था, उसे कम कराने के लिए सात दिन तक कनाडा के राष्ट्रध्यक्ष के विनती करने पर भी कम नहीं किया था। आज देश में उससे कौन सी परिस्थिति भिन्न है। अभी पर्यावरण के कारण या मौसम के बदलाव के चलते किसानों को दलहन का उत्पादन छोड़ना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में तो सरकार को किसानों को प्रोत्साहन देना चाहिए था। इसके विपरीत सरकार ने डीएपी एवं डीजल के दाम डेढ़ गुना से अधिक बढ़ाकर खेती का खर्चा ही बढ़ा दिया है। रामपाल जाट कहते हैं, सरकार पेट्रो उत्पादों के उत्पादक एवं वितरकों को प्रतिदिन मूल्य वृद्धि कर लाभ दे रही है, उसी प्रकार कृषि उत्पादकों को भी लाभ देने की नीति घोषित करनी चाहिए।
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कांग्रेस बोली- भाजपा का डीएनए ही किसान विरोधी

कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला के अनुसार, मोदी सरकार अन्नदाता से बदला लेने की साजिश बंद करे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा सरकार खेती को बर्बाद करने पर तुली है। सही मायनों में मोदी सरकार किसान की दुश्मन साबित हुई है। ऐसा लगता है कि देश के 62 करोड़ किसानों-मजदूरों को प्रधानमंत्री मोदी गुलाम बनाने की साजिश कर रहे हैं। कृषि सेंसस के मुताबिक, देश में 14.64 करोड़ किसान हैं, जो लगभग 15.78 करोड़ रकबे पर खेती करते हैं। पिछले 6.5 साल में मोदी सरकार ने खेती उत्पाद में इस्तेमाल की जाने वाली हर चीज की कीमत बढ़ाकर किसान पर पहले ही 15,000 रुपये प्रति हैक्टेयर सालाना का बोझ डाल रखा है।

वहीं महामारी की आड़ में डीएपी सहित अन्य खादों की कीमतें बढ़ाकर एक बार फिर किसान-मजदूर की कमर तोड़ने का घिनौना काम किया है। तीन काले कानून बना खेती को बेचने की साजिश, डीजल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि, खेती पर टैक्स, किसान की कर्जमाफी के नाम पर पीठ दिखाकर भाग खड़ा होना, फसल बीमा योजना के नाम पर लूट और अब खाद की कीमतें बढ़ा 20,000 करोड़ रुपये सालाना का अतिरिक्त भार डालना साबित करता है कि भाजपा का डीएनए ही किसान विरोधी है। डीएपी खाद के 50 किलो के बैग की कीमत मोदी सरकार ने रातों रात 1200 रुपये प्रति बैग से बढ़ाकर 1900 रुपये प्रति बैग कर डाली है। 700 रुपये प्रति डीएपी बैग की कीमत में बढ़ोत्तरी किसान की कमर तोड़ देगी। यह 73 साल में कभी नहीं हुआ।
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