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मोदी सरकार का कृषि मॉडल पहले ही आजमा चुकी है कांग्रेस, फेल हुई थी ये कोशिशः किसान नेता विजय जावंधिया

Fri, 04 Dec 2020 06:06 PM IST
Harendra Chaudhary डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • किसान नेता विजय जावंधिया से अमर उजाला डॉट कॉम की विशेष बातचीत
  • किसान नेता ने पूछा- एमएसपी को किसानों का कानूनी अधिकार बनाने से सरकार को क्या है आपत्ति
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Farmer Leader vijay jawandhiya - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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प्रख्यात किसान नेता विजय जावंधिया ने कहा है कि किसानों के हितों के नाम पर सरकार नए कृषि कानूनों के जरिए जो प्रयोग करने जा रही है, वे पहले ही कांग्रेस सरकारों के समय आजमाए जा चुके हैं, ये मॉडल फेल रहे हैं, इसलिए अब इन्हें बदले हुए तरीकों से पेश करने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने कहा है कि पूरी दुनिया में किसानों को घाटा होने पर वहां की सरकारें भारी सब्सिडी देकर उनका घाटा पूरा करती हैं। भारत सरकार को भी इसी तरह के मॉडल पर काम करना चाहिए। न्यूनतम समर्थन मूल्य को किसानों का कानूनी अधिकार बनाने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।

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शुक्रवार को अमर उजाला डॉट कॉम से विशेष बातचीत करते हुए विजय जावंधिया ने कहा कि सरकार ने किसानों की आय बढ़ाकर दोगुना करने की बात कही थी। प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 के चुनाव के समय अपने प्रचार के दौरान किसानों से उनके फसल का उत्पादन से 50 फीसदी अधिक मूल्य देने का वायदा किया था। लेकिन अब तक उन्हेंं यह समझ में आ चुका है कि ऐसा करना संभव नहीं हो पाएगा। इसीलिए इन कानूनों के जरिए सरकार समर्थन मूल्य देने की झंझट से हमेशा के लिए छुटकारा पाने की कोशिश कर रही है।

फेल हो चुका है यह प्रयोग

किसान नेता ने कहा कि मोदी सरकार किसानों की आय बढ़ाने के लिए अनुबंध खेती (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग) को बढ़ावा देने की योजना ला रही है, लेकिन इसके पहले 1986 में पेप्सी-कोला को पंजाब में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की अनुमति दी गई थी। लेकिन व्यावहारिक तौर पर जब किसानों ने गेहूं-धान की जगह फल-सब्जी उगाई और उन्हें कंपनी को बेचने की कोशिश की, तो कंपनी ने उनकी गुणवत्ता खराब बताकर खरीद से इनकार कर दिया। इस प्रकार के प्रयोग बताते हैं कि किसानों-कंपनियों का यह गठजोड़ कामयाब नहीं हुआ है।

नहीं मिलते दाम

उन्होंने कहा कि सरकार का यह कहना सरासर गलत है कि किसान पहले अपनी फसलों का मूल्य निर्धारित नहीं कर पाता था। बल्कि सच्चाई यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित हो जाने के बाद भी फसलों की वह कीमत बाजार में नहीं मिलती है। इस समय भी महाराष्ट्र में गेंहूं की फसल को 1100-1200 रुपये में बेचा जा रहा है, जबकि सरकार ने आने वाले वर्ष के लिए गेंहू का समर्थन मूल्य 1925 रुपये घोषित कर रखा है। उन्होंने कहा कि हर वर्ग के हितों की रक्षा आयोग बनाकर की जाती है। कर्मचारियों के वेतन तय करने के लिए आयोग की अनुशंसाओं को मान लिया जाता है, जबकि किसानों की आय बढ़ाने की कोई व्यवस्था नहीं की जाती। उन्होंने कहा कि सरकार को किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देने को उनका कानूनी अधिकार घोषित कर देना चाहिए।

मोदी सरकार से ज्यादा कीमतों की घोषणा पहले भी हो चुकी

केंद्र सरकार अपने समर्थन मूल्यों को अब तक के इतिहास में सबसे ज्यादा बताने का दावा करती है। लेकिन किसान नेता ने कहा कि इसके पहले मनमोहन सिंह सरकार ने 2008-9 में फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में ऐतिहासिक बढ़ोतरी की थी। उन्होंने कहा कि उस समय सरकार ने कपास की कीमतों को 2000 रुपये से बढ़ाकर 3000 रुपये प्रति क्विंटल तक कर दिया था। इसी प्रकार धान की कीमतों में भी भारी वृद्धि की गई थी।

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