Farmer Leader Pushpendra Singh
- फोटो : Pushpendra Singh (Facebook)
किसान नेता चौधरी पुष्पेंद्र सिंह ने कहा कि देश के किसान खुले बाजार में भी न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रावधान लागू कराने की मांग पर अडिग हैं। किसान इससे कम किसी बात पर समझौता करने को तैयार नहीं हैं। अगर सरकार नहीं मानती है तो किसान सड़कों पर उतरेंगे और वोट के जरिए अगले चुनाव में सरकार को सबक सिखाएंगे। हालांकि, उन्होंने कहा कि सरकार ने नए कानूनों के जरिए जिन सुधारों को लागू करने की कोशिश की है, इनकी मांग लंबे समय से की जा रही थी।
किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष चौधरी पुष्पेंद्र सिंह ने अमर उजाला डॉट कॉम से विशेष बातचीत के दौरान कहा कि शांताकुमार कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक आज भी देश का 94 फीसदी किसान खुले बाजार में अपनी फसल बेचता है। केवल छह फीसदी किसानों को एपीएमसी मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना का लाभ मिल पाता है। इसलिए अगर पूरे 100 फीसदी किसानों के लिए भी खुले बाजार की व्यवस्था लागू कर दी जाती है, तो इससे देश की कृषि अर्थव्यवस्था पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा।
लेकिन उन्होंने कहा कि फसलों की खरीद-बिक्री के लिए एपीएमसी मंडियों और खुले बाजार की व्यवस्था समानांतर रूप से लागू की जानी चाहिए। खुले बाजार की सुविधा के कारण एपीएमसी मंडियों की व्यवस्था खत्म नहीं की जानी चाहिए। लेकिन दोनों ही प्रकार के बाजारों में टैक्स और एमएसपी को लेकर एक जैसा प्रावधान लागू किया जाना चाहिए। इससे आढ़ितियों के साथ-साथ किसानों को सबको लाभ होगा।
क्या फसलों के भंडारण क्षमता की अधिकतम सीमा से प्रतिबंध हटाने पर इनके होर्डिंग और काला बाजारी की समस्या पैदा हो सकती है? अमर उजाला के इस सवाल पर कृषि विशेषज्ञ पुष्पेंद्र सिंह ने कहा कि इस समय देश में कृषि फसलों का अत्यधिक उत्पादन हो रहा है। आज देश में 30 करोड़ टन खाद्यान्न का उत्पादन हो रहा है। सरकार की व्यवस्था में अधिकतम 10 करोड़ टन तक की ही खरीद हो पाती है। इस प्रकार लगभग 70 फीसदी खरीद आज भी खुले बाजार के माध्यम से हो रही है। ऐसे में इतनी भारी मात्रा में खरीद और होर्डिंग किसी के लिए भी संभव नहीं है।
साथ ही खेती की जमीनों का मूल्य इतना अधिक है कि किसी उद्योगपति के द्वारा एक बार में भारी मात्रा में जमीनों की खरीद और उस पर खेती कर लाभ कमाने की बात व्यावहारिक नहीं लगती है। इसलिए नए कानूनों के बाद कॉर्पोरेट फॉर्मिंग का खतरा नहीं है। लेकिन अगर कांट्रैक्ट फार्मिंग की बात की जाती है और किसानों को पहले से तय मूल्य मिल जाता है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। अभी भी गन्ना और दूध जैसी अनेक चीजों में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की जा रही है और किसानों की सहमति से यह आगे बढ़ रहा है। चूंकि, कॉन्ट्रैक्ट फसलों का होता है, जमीनों का नहीं, इसमें किसानों के हितों को चोट पहुंचने की कोई संभावना नहीं है।