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Fact-Check: चीन पर भरोसा ना करने की पूर्वजों की चेतावनी, कितना सच है सोशल मीडिया का दावा?

Sat, 20 Jun 2020 02:36 PM IST
Tanuja Yadav न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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श्रीरंगम में स्थित प्रतिमा की वायरल फोटो - फोटो : AMAR UJALA
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भारत और चीन के बीच सीमा पर तनातनी बढ़ने के बाद सोशल मीडिया पर एक मंदिर परिसर की तस्वीर तेजी से वायरल हो रही है। इस तस्वीर के साथ संदेश दिया गया है कि चीन ने हमेशा पीठ पर पीछे से वार किया है, इसलिए उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। ट्विटर पर एक यूजर ने तमिलनाडु के सुप्रसिद्ध श्रीरंगम मंदिर में बनी एक प्रतिमा की तस्वीर को शेयर करते हुए लिखा कि प्राचीनकाल में तमिल व्यापारी दुनिया भर में व्यापार करते थे। उनका कारोबार चीन तक फैला हुआ था।

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यूजर ने लिखा कि उस समय दक्षिण-पूर्व एशिया के साम्राज्यों के बीच व्यापार को लेकर आपस में प्रतिस्पर्धा थी। ट्वीट की गई पोस्ट में दावा किया गया है कि तस्वीर में एक चीनी व्यापारी की प्रतिमा दिख रही है। जो तमिल व्यापारी पर पीछे से हमला कर रहा है। पोस्ट में लिखा गया है कि ये केवल प्रतिमा नहीं है बल्कि हमारे पूर्वजों की चीन के लोगों पर भरोसा न करने की चेतावनी है। ऐसे कई यूजर्स हैं जो इस तस्वीर के सच होने का दावा करते हुए इसे वायरल कर रहे हैं।





यह वायरल फोटो कितनी सच है और कितने पूर्वाग्रहों से ग्रसित, ये पता लगाने के लिए अमर उजाला की पड़ताल टीम ने हर सिरे से इसकी जांच की। अमर उजाला ने पाया कि तमिलनाडु के श्रीरंगम मंदिर में इस तरह की कई प्रतिमाएं हैं लेकिन उनका संदेश ये नहीं है जो वायरल तस्वीर में बताया जा रहा है।
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क्या है वायरल फोटो का सच?
ये प्रतिमा तमिनाडु के विश्व प्रसिद्ध श्रीरंगम मंदिर की है, जिसे रंगनाथस्वामी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। ये मंदिर भगवान रंगनाथ को समर्पित है और इन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। श्रीरंगम में स्थित एक सफेद इमारत वाले मंदिर को वेल्लाई गोपुरम कहा जाता है, ये नाम महान योद्धा वेल्लाईअम्मल (Vellayiammal) की बहादुरी और त्याग के सम्मान पर रखा गया है। इन्होंने सन् 1323 में मुस्लिम हमलावरों  को भगवान रंगनाथ की मूर्ति चुराने से रोका था।

सन् 1323 में मुस्लिम हमलावरों ने श्रीरंगम पर आक्रमण किया था, ये तमिल महीने के वैसाखी का दिन था। तुगलक वंश के पहले शासक घियासुद्दीन तुगलक के खूंखार बेटे उलूग खान उर्फ मुहम्मद बिन तुगलक ने मंदिर पर हमला किया था। उलूग खान की सेना भगवान रंगनाथ के जेवर और कई किलो सोना चुराने में कामयाब रही।

भगवान रंगनाथ की मूर्ति को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए वेल्लाई ने सेनापति के सामने नृत्य पेश किया था ताकि पिलाईलोकाचार्य को भगवान रंगनाथ की मूर्ति ले जाने के लिए ज्यादा समय मिल सके। घंटों तक नृत्य पेश करने के बाद वेल्लाई, सेनापति को पूर्वी गोपुरम की ओर ले आई और वहां से उसे धक्का देकर नीचे गिरा दिया। बाद में खुद भगवान रंगनाथ के नाम का उद्घोष करते हुए वेल्लाई ने भी छलांग लगाकर अपनी जान दे दी थी।

इसके बाद पिलाईलोकाचार्य, भगवान रंगनाथ की मूर्ति को मदुरई के पास एकांत इलाके में ले आए, जहां ये मूर्तियां लगभग 50 साल तक रही। विजयनगर साम्राज्य के बुक्का राया के बेटे जनरल कुमार कंपन्ना के साहसिक पराक्रम ने ही श्रीरंगम मंदिर को तुगलकों के शासन से आजाद करवाया। कुमार कंपन्ना को वेल्लाई की वीरता और त्याग से प्रेरणा मिली।

पड़ताल का निष्कर्ष
विजयनगर साम्राज्य के नायकों ने बाद में श्रीरंगम मंदिर का विस्तार और पुनर्निमाण किया। उन्होंने वेल्लाई गोपुरम से सटाकर एक बेहद विशाल शेशर्य मंतपम (Shesharaya Mantapam) का निर्माण किया। ये विशाल स्तंभ विजयनगर साम्राज्य के सैनिकों को दी गई एक तरह से श्रंदाजलि हैं, जिन्होंने दिल्ली सल्तनत के खूंखार आक्रामणकारियों को परास्त किया था। इस स्तंभ में तुगलक हमलावरों से हुए युद्ध को मूर्तियों के रूप में अंकित किया गया है। एक तुगलक हमलावर की इसी मूर्ति को चीन के व्यापारी की बताकर सोशल मीडिया पर वायरल किया जा रहा है।
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