विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चीन को जमकर कोसते हुए कहा, वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव के बाद से भारत और चीन के रिश्ते चौराहे पर हैं। अब आगे का रास्ता इस बात से तय होगा कि चीनी पक्ष आपसी सहमति या द्विपक्षीय समझौतों को मानेंगे या नहीं।
जयशंकर ने एक वेबिनॉर में कहा, बीते साल चीन की सेना के चलते लद्दाख में तनाव बढ़ा। उन्होंने कहा, चीन ने बीते साल 1988 में बनी आपसी सहमति को दरकिनार कर दिया था। अगर आप शांति और सद्भाव भंग करते हो, आक्रामकता दिखाते हो या फिर लगातार टकराव बनाए रखते हो तो इसका असर द्विपक्षीय रिश्तों पर पड़ना लाजिमी है।
बीते साल भी हमने स्पष्ट रूप से कहा था कि सीमा पर तनाव और सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते। 21वीं सदी में अमेरिका और चीन के बीच संबंधों के संदर्भ में भू-राजनीतिक स्थिति पर एक सवाल का जवाब देते हुए विदेश मंत्री ने कहा, यह शीत युद्ध 2.0 नहीं है, क्योंकि यह उस तरह का सैन्य संघर्ष नहीं है जैसा कि शीत युद्ध 1.0 में होता है। यह राजनीति चमकाने का एक विरोधाभास है, जहां देशों के बीच मूल्य, व्यवस्था, विश्वास और स्वतंत्रता परस्पर निर्भरता पर आधारित है।
आगे कहा कि भारत और चीन ने कई दौर की कूटनीतिक और सैन्य वार्ताओं के बाद लद्दाख में पैंगोंग झील के इलाके से अपनी सेनाएं हटा ली हैं। दोनों पक्ष फिलहाल टकराव वाली तीन जगहों गोगरा, हॉट स्प्रिंग्स और डेपसांग मैदान से सैनिकों को हटाने पर बातचीत कर रहे हैं, मगर अभी तक कोई सहमति नहीं बन पाई है।
1988 में चीन गए थे राजीव गांधी, तभी हुआ था समझौता
जयशंकर ने कहा, 1962 के संघर्ष के बाद 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी चीन गए थे। उस वक्त दोनों देशों के बीच अग्रिम मोर्चों पर स्थिरता बनाए रखने पर सहमति बनी थी। इसके बाद 1993 और 1996 में भी शांति और सद्भाव कायम रखने के लिए दो अहम समझौते हुए।
प्रतिस्पर्धा करना अलग बात, सीमा पर हिंसा दूसरी बात
क्षेत्र में चीन के बढ़ रहे प्रभाव के बारे में पूछे जाने पर जयशंकर ने कहा, भारत भी इस प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार है। भारत में यह स्वाभाविक क्षमता है कि वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रिश्तों पर असर डाल सके। चाहे वह अफ्रीका हो या यूरोप। प्रतिस्पर्धी बनना अलग बात है, जबकि सीमा पर हिंसा दूसरी बात है। मेरे लिए यह मुद्दा यही है कि अगर दूसरा पक्ष हिंसा पर उतारू है तो मैं इस रिश्ते को कैसे व्यवस्थित करूं?
सैनिकों के पीछे हटने की प्रक्रिया जल्द पूरी हो: विदेश मंत्रालय
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा, क्षेत्र में सैनिकों के पीछे हटने की प्रक्रिया जल्द पूरी होनी चाहिए और सीमावर्ती इलाकों में पूर्ण रूप से शांति बहाली से ही द्विपक्षीय संबंधों में प्रगति सुनिश्चित की जा सकती है।
उन्होंने कहा, विदेश मंत्री ने इस वर्ष शुरू की गई सैनिकों के पीछे हटने की प्रक्रिया के बारे में 30 अप्रैल को अपने चीनी समकक्ष के साथ चर्चा की थी और यह बताया था कि यह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है और इसे जल्द पूरा किया जाना चाहिए। इस संदर्भ में यह सहमति बनी कि वे जमीन पर स्थिरता बनाए रखेंगे और किसी नई घटना से बचेंगे।