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Explainer: क्या पुरानी पेंशन योजना लागू करने वाले राज्य कर्ज में डूब जाएंगे, जानें इसका आपकी जेब पर असर?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Wed, 17 May 2023 10:39 AM IST

सार

सवाल उठने लगा है कि क्या सच में पुरानी पेंशन योजना लागू करने वाले राज्य कर्ज में डूब जाएंगे? इस योजना से राज्यों और केंद्र सरकार को कितना नुकसान होगा? पुरानी पेंशन और नई पेंशन योजना क्या है? पुरानी पेंशन योजना से आम लोगों की जेब पर कितना बोझ बढ़ता है? आइए समझते हैं... 
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पुरानी पेंशन योजना - फोटो : अमर उजाला
राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब और हिमाचल प्रदेश। ये वो राज्य हैं, जहां पुरानी पेंशन योजना लागू हो चुकी है। अब इस सूची में जल्द ही कर्नाटक का नाम भी जुड़ जाएगा। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने इसका वादा किया था। अब कर्नाटक में कांग्रेस चुनाव जीत गई है, तो जल्द ही यहां भी पुरानी पेंशन योजना लागू हो सकती है। 

इस बीच, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश का एक बयान सामने आया है। इसमें उन्होंने पुरानी पेंशन योजना बहाल होने से देश की आर्थिक स्थिति खराब होने का अंदेशा जताया है। इसकी तुलना श्रीलंका, पाकिस्तान जैसे देशों से की। उन्होंने यहां तक कह दिया कि पुरानी पेंशन योजना लागू करने वाले राज्य कर्ज में डूब जाएंगे। एक समय ऐसा आएगा जब इससे देश की आर्थिक स्थिति खराब हो जाएगी। 


इससे सवाल उठने लगा है कि क्या सच में पुरानी पेंशन योजना लागू करने वाले राज्य कर्ज में डूब जाएंगे? इस योजना से राज्यों और केंद्र सरकार को कितना नुकसान होगा? पुरानी पेंशन और नई पेंशन योजना क्या है? आइए समझते हैं... 
 
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पुरानी पेंशन योजना - फोटो : अमर उजाला
राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब और हिमाचल प्रदेश। ये वो राज्य हैं, जहां पुरानी पेंशन योजना लागू हो चुकी है। अब इस सूची में जल्द ही कर्नाटक का नाम भी जुड़ जाएगा। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने इसका वादा किया था। अब कर्नाटक में कांग्रेस चुनाव जीत गई है, तो जल्द ही यहां भी पुरानी पेंशन योजना लागू हो सकती है। 

इस बीच, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश का एक बयान सामने आया है। इसमें उन्होंने पुरानी पेंशन योजना बहाल होने से देश की आर्थिक स्थिति खराब होने का अंदेशा जताया है। इसकी तुलना श्रीलंका, पाकिस्तान जैसे देशों से की। उन्होंने यहां तक कह दिया कि पुरानी पेंशन योजना लागू करने वाले राज्य कर्ज में डूब जाएंगे। एक समय ऐसा आएगा जब इससे देश की आर्थिक स्थिति खराब हो जाएगी। 

इससे सवाल उठने लगा है कि क्या सच में पुरानी पेंशन योजना लागू करने वाले राज्य कर्ज में डूब जाएंगे? इस योजना से राज्यों और केंद्र सरकार को कितना नुकसान होगा? पुरानी पेंशन और नई पेंशन योजना क्या है? आइए समझते हैं... 
 

पहले राज्ससभा के उपसभापति का बयान जान लीजिए
हरिवंश ने मीडिया की खबरों में जताए गए अनुमान का हवाला देते हुए कहा कि जिन पांच राज्यों ने पुरानी पेंशन योजना बहाल की है, उनके सरकारी खजाने पर कुल मिलाकर तीन लाख करोड़ रुपये का बोझ बढ़ गया है। हरिवंश ने राजस्थान का उदाहरण देते हुए कहा कि इससे राजस्थान के कुल कर राजस्व का 56 प्रतिशत हिस्सा केवल छह फीसद सरकारी कर्मचारियों पर खर्च होगा।'
 

अब समझिए पुरानी पेंशन योजना क्या थी?
केंद्र और राज्यों में सरकारी कर्मचारियों के लिए पेंशन अंतिम आहरित मूल वेतन का 50 प्रतिशत निर्धारित किया गया था। मतलब सेवा के आखिरी दौर में जितना वेतन मिलता था, उसका आधा प्रतिमाह रिटायरमेंट के बाद पेंशन के तौर पर मिलता था। इसके लिए कर्मचारियों के वेतन से कटौती भी नहीं होती थी। 

उदाहरण के लिए, अगर किसी रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी का सेवा में रहते हुए मासिक मूल वेतन 10,000 रुपये था, तो उसे 5,000 रुपये की पेंशन का आश्वासन दिया जाता था। इसके अलावा सरकार द्वारा सेवारत कर्मचारियों के लिए घोषित महंगाई भत्ते या डीए में बढ़ोतरी का असर भी पेंशनभोगियों के मासिक भुगतान पर पड़ता था। मतलब भत्ते और डीए का लाभ पेंशनभोगियों को भी मिलने लगता था। 

अभी तक सरकार द्वारा भुगतान की जाने वाली न्यूनतम पेंशन नौ हजार रुपये प्रति माह है और अधिकतम 62,500 रुपये है। (केंद्र सरकार में उच्चतम वेतन का 50 प्रतिशत, जो कि 1,25,000 रुपये प्रति माह है)। पुरानी पेंशन योजना यानी OPS को 2004 में बंद कर दिया गया था। इसके बदले नई पेंशन योजना लागू कर दी गई। 
 

पुरानी पेंशन योजना - फोटो : अमर उजाला
पुरानी पेंशन योजना से सरकार को क्या दिक्कत थी? 
  • मुख्य समस्या यह थी कि पेंशन की देनदारी अनफंडेड रही। मतलब आय का कोई जरिया नहीं था और भुगतान की राशि में लगातार इजाफा होते जा रहा था। 
  • भारत सरकार के बजट में हर साल पेंशन के लिए प्रावधान किया जाता है। भविष्य में साल दर साल भुगतान कैसे किया जाए, इस पर कोई स्पष्ट योजना नहीं थी।  
  • एक तरफ पेंशन की देनदारियां बढ़ती जा रही थीं तो दूसरी ओर हर साल पेंशनर्स को दी जाने वाली सुविधाओं में भी बढ़ोतरी। मतलब महंगाई भत्ता, डीए से पेंशन भुगतान की राशि में और भी इजाफा होने लगा था। 
  • पिछले तीन दशकों में केंद्र और राज्यों के लिए पेंशन देनदारियां कई गुना बढ़ गई। 1990-91 में केंद्र का पेंशन बिल 3,272 करोड़ रुपये था और सभी राज्यों के लिए कुल व्यय 3,131 करोड़ रुपये था। 2020-21 तक, केंद्र का बिल 58 गुना बढ़कर 1,90,886 करोड़ रुपये हो गया। राज्यों के लिए यह 125 गुना बढ़कर 3,86,001 करोड़ रुपये हो गया।

नई पेंशन योजना की कहानी कहां शुरू हुई?
1998 में केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने वृद्धावस्था सामाजिक और आय सुरक्षा (OASIS) परियोजना के लिए एक रिपोर्ट तैयार की। समिति ने पाया कि कुल कामकाजी आबादी के 11 प्रतिशत से भी कम लोगों के पास सेवानिवृत्ति के बाद की कुछ आय सुरक्षा थी।

 यह सरकारी पेंशन, कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) या कर्मचारी पेंशन योजना (ईपीएस) के रूप में थी। शेष कार्यबल के पास सेवानिवृत्ति के बाद की आर्थिक सुरक्षा का कोई साधन नहीं था। OASIS रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि व्यक्ति तीन प्रकार के फंडों में निवेश कर सकते हैं। 

1. सुरक्षित इक्विटी में 10 प्रतिशत तक निवेश की अनुमति 
2. संतुलित इक्विटी में 30 प्रतिशत तक
3. विकास इक्विटी में 50 प्रतिशत तक

समिति की सिफारिश थी कि सेवानिवृत्ति के बाद, रिटायरमेंट अकाउंट कम से कम दो लाख रुपये का उपयोग वार्षिकी खरीदने के लिए किया जाएगा। (इसमें कर्मचारी का पैसा निवेश किया जाता है और प्रति माह एक फिस्ड सैलरी दी जाती है। जो उस वक्त करीब 1500 रुपये थी।)  

OASIS रिपोर्ट प्रस्तुत होने के डेढ़ साल बाद कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय ने कर्नाटक के पूर्व मुख्य सचिव, बी के भट्टाचार्य के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह (HLEG) का गठन किया। जिसने रिपोर्ट के अनुसार, कर्मचारियों की स्थिति की जांच की। कुछ सुझाव भी दिए गए। हालांकि, सरकार ने 22 फरवरी 2002 को इसे खारिज कर दिया। 

 

पुरानी पेंशन - फोटो : अमर उजाला
फिर नई पेंशन योजना आई 
प्रोजेक्ट OASIS रिपोर्ट द्वारा प्रस्तावित नई पेंशन प्रणाली पेंशन सुधारों का आधार बनी और मूल रूप से असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए जो कल्पना की गई थी, उसे सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए अपना लिया। केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए नई पेंशन योजना (एनपीएस) को 22 दिसंबर, 2003 को अधिसूचित किया। 
कुछ अन्य देशों के विपरीत, एनपीएस संभावित कर्मचारियों के लिए था। इसे एक जनवरी, 2004 से सरकारी सेवा में शामिल होने वाले सभी नए भर्ती के लिए अनिवार्य कर दिया गया। इसमें कर्मचारियों के वेतन और महंगाई भत्ते का 10 प्रतिशत प्रतिमाह काटा जाता है। जिसे नई पेंशन योजना में दिया जाता है। 

 यह टीयर एक था, जिसमें योगदान अनिवार्य था। जनवरी 2019 में सरकार ने अपना योगदान बढ़ाकर मूल वेतन और महंगाई भत्ते का 14 फीसदी कर दिया। नई पेंशन योजना में जीपीएफ की सुविधा उपलब्ध नहीं है, जबकि पुरानी पेंशन योजना में ये सुविधा कर्मचारियों को मिलती थी। नई पेंशन स्कीम शेयर मार्केट पर आधारिक है। ऐसे में अगर मार्केट बढ़िया रहा तो कर्मचारियों को रिटायरमेंट के दौरान अच्छा पैसा मिल सकता है। हालांकि, कम रिटर्न की स्थिति में फंड भी कम हो सकता है। 

पुरानी पेंशन स्कीम में 20 लाख रुपये तक ग्रेच्युटी की रकम मिलती है। रिटायर्ड कर्मचारी की मृत्यु होने पर उसके ऊपर आश्रित परिजनों को पेंशन की राशि मिलती है। ये सभी नई पेंशन स्कीम में नहीं मिलते हैं। 
 

इन कंपनियों में नई पेंशन स्कीम का पैसा निवेश होता है 
एनपीएस के तहत योजनाओं की पेशकश नौ पेंशन फंड प्रबंधकों द्वारा की जाती है। इसमें एसबीआई, एलआईसी, यूटीआई, एचडीएफसी, आईसीआईसीआई, कोटक महिंद्रा, आदित्य बिड़ला, टाटा और मैक्स शामिल हैं। इसमें दी जाने वाली विभिन्न योजनाओं का जोखिम प्रोफाइल 'निम्न' से 'बहुत अधिक' तक भिन्न होता है। एसबीआई, एलआईसी और यूटीआई द्वारा मंगाई गई एनपीएस योजना-केंद्र सरकार के लिए 10 साल का रिटर्न 9.22 प्रतिशत रहा। पांच साल का रिटर्न 7.99 फीसदी और एक साल का रिटर्न 2.34 फीसदी है। उच्च जोखिम वाली योजनाओं पर रिटर्न 15 फीसदी तक हो सकता है।

पिछले आठ वर्षों में, एनपीएस ने एक मजबूत ग्राहक आधार बनाया है और प्रबंधन के तहत इसकी संपत्ति में वृद्धि हुई है। 31 अक्तूबर, 2022 तक, केंद्र सरकार के पास 23,32,774 ग्राहक थे, और राज्यों में 58,99,162 ग्राहक थे। कॉर्पोरेट क्षेत्र में 15,92,134 ग्राहक थे, और असंगठित क्षेत्र में 25,45,771 थे। एनपीएस स्वावलंबन योजना के तहत 41,77,978 ग्राहक थे। 31 अक्टूबर, 2022 तक इन सभी सब्सक्राइबर्स के प्रबंधन के तहत कुल संपत्ति 7,94,870 करोड़ रुपये थी।

 

पुरानी पेंशन - फोटो : सोशल मीडिया
तब कांग्रेस ने अटल बिहारी वाजपेयी की इस योजना को स्वीकार कर लिया था
2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नई पेंशन स्कीम को लागू किया था। 1 जनवरी, 2004 से एनपीएस सरकार में नई भर्तियों के लिए प्रभावी हो गया। उसी साल सरकार बदली और कांग्रेस सत्ता में आ गई। कांग्रेस ने वाजपेयी की इस स्कीम को ठीक उसी तरह लागू कर दिया। 

 

पुरानी पेंशन को क्यों खराब मानती है सरकार? 
30 साल में राज्यों का संचयी पेंशन बिल 1990-91 में 3,131 करोड़ रुपये से बढ़कर 2020-21 में 3,86,001 करोड़ रुपये हो गया है। कुल मिलाकर, राज्यों द्वारा पेंशन भुगतान उनके स्वयं के कर राजस्व का एक चौथाई खा जाता है। कुछ राज्यों में यह बहुत अधिक है। हिमाचल में राजस्व का यह लगभग 80 प्रतिशत है। पंजाब में यह लगभग 35 प्रतिशत है। छत्तीसगढ़ में 24 प्रतिशत और राजस्थान में 30 प्रतिशत। मतलब राज्य सरकारों की कमाई का ज्यादातर हिस्सा पेंशन पर ही खत्म हो जाता है। अगर राज्य सरकार के कर्मचारियों के वेतन और वेतन को इस विधेयक में जोड़ दिया जाए तो राज्यों के पास अपनी कर प्राप्तियों से मुश्किल से ही कुछ बचता है। 

इंटर-जेनरेशनल इक्विटी का मुद्दा भी काफी बड़ा है। आज के करदाता सेवानिवृत्त लोगों की लगातार बढ़ती पेंशन के लिए भुगतान कर रहे हैं। आलम ये है कि वेतन आयोग की सिफारिशों के चलते सेवानिवृत्त लोगों की पेंशन को लगभग वर्तमान स्तर पर ले जा रहे हैं। मतलब 1995 में सेवानिवृत्त होने वाले व्यक्ति की पेंशन 2025 में सेवानिवृत्त होने वाले व्यक्ति के समान हो सकती है।

इससे आम आदमी की जेब पर भी कोई असर पड़ता है क्या?
विशेषज्ञ कहते हैं कि करदाताओं की वर्तमान पीढ़ी न केवल 2004 से पहले सरकारी सेवा में शामिल होने वालों के पेंशन बिल का भुगतान कर रही है, बल्कि 1 जनवरी, 2004 से शामिल होने वालों के लिए राज्य सरकारें जो 10 प्रतिशत योगदान दे रही हैं, उसमें भी योगदान दे रही हैं। कुल मिलाकर अगर पुरानी पेंशन को ज्यादातर राज्यों में लागू कर दिया गया तो लगभग सभी राज्य भारी कर्ज में डूब जाएंगे। इससे आर्थिक हालात काफी खराब हो सकती है।

अमर उजाला से अपने पाठकों से पूछा था सवाल
इस मुद्दे को लेकर अमर उजाला वेबसाइट पर अब तक 1 लाख 17 हजार से ज्यादा लोग वोट कर चुके हैं। पोल में शामिल होने वाले कुल लोगों में से 1 लाख 17 हजार से ज्यादा (करीब 99 फीसदी) लोगों ने कहा है कि आगामी चुनावों में पुरानी पेंशन स्कीम का मुद्दा निर्णायक साबित होगा। दूसरी तरफ महज 910 लोगों (करीब 0.77 फीसदी) लोगों ने अगले चुनावों में इस मुद्दे के बेअसर रहने की बात कही है। पढ़ें पूरी खबर
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