भले ही भारत विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, लेकिन देश की जनसंख्या की तस्वीर तेजी से बदल रही है। आज कई राज्यों में परिवार छोटे हो रहे हैं, प्रजनन दर लगातार घट रही है और बुजुर्ग आबादी का हिस्सा बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद यानी ईएसी-पीएम की सितंबर 2026 के वर्किंग पेपर 'द घोस्ट ऑफ पॉपुलेशन पास्ट: हाउ पॉपुलेशन कंट्रोल पर्सिस्ट्स इन इंडिया' में भारत की मौजूदा प्रजनन स्थिति, पुरानी जनसंख्या नियंत्रण नीतियों, नसबंदी से जुड़े आर्थिक प्रोत्साहनों और दो-बच्चे की शर्तों का विश्लेषण किया गया है।
आइए जानते हैं इस पेपर में क्या बताया गया है? भविष्य को लेकर नीतियों में किस तरह के बदलाव का सुझाव दिया गया है? जिस दौर में सरकार की प्राथमिकता आबादी की तेज बढ़ोतरी को रोकना थी, क्या उसी दौर की नीतियां आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं?
जनसंख्या
- फोटो : Amar Ujala
रिपोर्ट में भारत की प्रजनन दर को लेकर क्या कहा गया है?
रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कुल प्रजनन दर 1.9 है। जो मानक प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे है। उत्तर प्रदेश में यह 2.6 और बिहार में 2.9 है। इन दोनों राज्यों को अलग कर दें तो बाकी भारत की प्रजनन दर 1.6 रह जाती है। जो और भी चिंताजनक स्तर पर है। दक्षिण भारत के कई राज्यों में यह और ज्यादा कम है।
- आंध्र प्रदेश: 1.4
- तेलंगाना: 1.5
- कर्नाटक: 1.5
- केरल:1.3
- तमिलनाडु: 1.3
इसके अलावा पश्चिम बंगाल में 1.3, पंजाब में 1.4, गोवा में 1.6, हिमाचल प्रदेश में 1.5, सिक्किम में 1.0, महाराष्ट्र में 1.4 और दिल्ली में 1.2 प्रजनन दर है। इन राज्यों में प्रजनन दर दो दशक से ज्यादा समय से प्रतिस्थापन स्तर से नीचे बनी हुई है।
इसका मतलब क्या है?
भारत की कुल प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट) अब 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ गई है। प्रतिस्थापन स्तर 2.1 होने का मतलब है कि एक दंपति औसतन इतने बच्चे पैदा कर रही है, जो अगली पीढ़ी में उनकी जगह ले सकें। मौजूदा समय में, भारत की प्रजनन दर गिरकर 1.9 रह गई है।
इसे सीधे शब्दों में समझें तो भारत में जितने लोगों की मृत्यु हो रही है, उनकी जगह लेने लायक नए जन्म नहीं हो रहे। इससे भारत की आबादी में जल्द ही युवाओं की कमी देखने को मिल सकती है, जो कि लंबी अवधि में भारत की आबादी घटाने वाला साबित होगा।
प्रजनन दर
- फोटो : Amar Ujala
हर साल पैदा होने वाले बच्चों की संख्या कितनी घटी?
देश में हर साल पैदा होने वाले बच्चों की संख्या में भी बड़ी गिरावट आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2001 में सालाना जन्मों की संख्या करीब 2.93 करोड़ थी। 2023 तक यह घटकर 2.32 करोड़ रह गई। यानी करीब दो दशक में सालाना जन्मों की संख्या में लगभग 20 फीसदी की कमी आई। रिपोर्ट के अनुसार 2023 में पैदा हुए बच्चों की संख्या करीब 1974 के स्तर के बराबर थी।
फिर हम विश्व की सबसे ज्यादा आबादी वाले देश कैसे बन गए?
वर्ल्डोमीटर के अनुसार, भारत की कुल आबादी लगभग 147 से 148 करोड़ के बीच में है। अब यहां एक अहम अंतर समझना जरूरी है, प्रजनन दर घटने और कुल आबादी घटने के बीच तुरंत संबंध नहीं होता।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की आबादी पर पहले की उच्च प्रजनन दर का असर अभी भी है। बड़ी संख्या में युवा आबादी मौजूद होने के कारण कम प्रजनन दर के बावजूद कुछ समय तक आबादी बढ़ती रह सकती है। यही वजह है कि देश की कुल आबादी बढ़ रही है, जबकि नए जन्मों की संख्या कम हो रही है।
कम प्रजनन दर का असर आबादी की उम्र की संरचना पर भी पड़ता है। रिपोर्ट के मुताबिक, जिन राज्यों में प्रजनन दर लंबे समय से कम है, वहां मध्य आयु करीब 35 वर्ष है। इसके मुकाबले भारत की राष्ट्रीय मध्य आयु करीब 30 वर्ष है।
आंध्र प्रदेश के मामले में रिपोर्ट के अनुसार 2036 तक 0-14 वर्ष की आबादी का हिस्सा 16 फीसदी से नीचे जा सकता है, जबकि 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र की आबादी का हिस्सा करीब 19 फीसदी हो सकता है।
प्रजनन दर
- फोटो : Amar Ujala
घटती प्रजनन दर पर सरकारें क्या कर रही हैं?
बदलती जनसांख्यिकीय स्थिति के बीच कुछ राज्यों ने दो-बच्चे से जुड़े नियमों को हटाया है। इन राज्यों में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्य शामिल हैं।
| राज्य |
कब हटा दो बच्चे से जुड़ा नियम |
| आंध्र प्रदेश |
नवंबर 2024 |
| तेलंगाना |
जनवरी 2026 |
| राजस्थान |
मार्च 2026 |
| मध्य प्रदेश |
जून 2026 |
वहीं असम में दो से अधिक बच्चों वाले लोगों पर कुछ सरकारी योजनाओं, स्थानीय चुनाव और सरकारी नौकरी से जुड़ी पाबंदियां अभी मौजूद हैं।
आंध्र प्रदेश में कैसे बदली पूरी दिशा?
आंध्र प्रदेश में प्रजनन दर दो दशक से ज्यादा समय से प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है। रिपोर्ट के मुताबिक करीब 70 फीसदी विवाहित महिलाओं की नसबंदी हो चुकी है, जो देश में सबसे अधिक है।
2024-26 तक राज्य में करीब ₹12 करोड़ सालाना का प्रावधान 1.25 लाख महिला नसबंदी से जुड़े प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के लिए था। लेकिन 2026-27 में पुरुष और महिला नसबंदी से जुड़े प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के लिए कोई वित्तीय संसाधन बजट में नहीं रखा गया। इसके साथ ही दो-बच्चे की शर्त भी हटा दी गई। आंध्र प्रदेश की प्रस्तावित जनसंख्या प्रबंधन कार्यक्रम 2026 में दूसरे और तीसरे बच्चे के जन्म को प्रोत्साहित करने का प्रस्ताव है।
इसके तहत दूसरे बच्चे के जन्म पर एक बार ₹2,000 और तीसरे बच्चे के लिए पहले पांच वर्षों तक हर महीने ₹1,000 देने की बात है। तीन या उससे अधिक बच्चों वाले परिवारों के बच्चों की शिक्षा का पूरा खर्च उठाने और ऐसे परिवारों को आजीवन स्वास्थ्य बीमा देने का प्रस्ताव भी है। इन प्रस्तावित प्रोत्साहनों पर सालाना खर्च करीब ₹1,000 करोड़ हो सकता है।
तमिलनाडु में एक साथ दो तरह की नीतियां
अगस्त 2026 में तमिलनाडु ने सरकारी महिला कर्मचारियों के लिए तीसरे बच्चे के जन्म पर मातृत्व अवकाश को 12 सप्ताह से बढ़ाकर एक साल कर दिया। वहीं, 2026-27 के बजट में 1.6 लाख महिला नसबंदी के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण का प्रावधान भी था। रिपोर्ट ने इन दोनों व्यवस्थाओं को विरोधाभासी बताया है।
परिवार नियोजन को लेकर लोगों की सोच कैसे बदली?
जनसंख्या नियंत्रण की सरकारी नीतियों के साथ समाज में भी परिवार के आकार को लेकर बदलाव आया है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार, ज्यादातर भारतीयों की आदर्श परिवार आकार की पसंद पहले ही दो बच्चों या उससे कम तक पहुंच चुकी है। एसआरएस 2024 के मुताबिक पहले बच्चे के जन्म के समय औसत उम्र 28.4 वर्ष हो गई है, जबकि 2011 में यह 21.2 वर्ष थी। रिपोर्ट यह भी बताती है कि वास्तविक और इच्छित प्रजनन दर के बीच का अंतर कम हो रहा है।
ईएसी ने पुरानी व्यवस्था में क्या बदलाव सुझाए?
रिपोर्ट ने मौजूदा जनसंख्या नीति में कई बदलावों की सिफारिश की है।
- नसबंदी से जुड़े प्रोत्साहन खत्म करने की सिफारिश: नसबंदी कराने वाले व्यक्ति को दिए जाने वाले प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, मजदूरी के नुकसान का मुआवजा और नसबंदी से जुड़े अतिरिक्त प्रोत्साहन वापस लेने की बात कही गई है।
- आशा प्रोत्साहन में बदलाव: दो बच्चों तक परिवार सीमित रखने या स्थायी गर्भनिरोधक अपनाने से जुड़े आशा प्रोत्साहन खत्म करने की सिफारिश की गई है।
- दो-बच्चे की शर्त हटाने की सिफारिश: दो-बच्चे की शर्त के आधार पर सरकारी नौकरी, स्थानीय चुनाव या अन्य सरकारी लाभों से जुड़ी अयोग्यता खत्म करने की सिफारिश की गई है।
- मिशन परिवार विकास में बदलाव: जिन राज्यों में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर पर या उससे नीचे है, वहां मिशन परिवार विकास की भूमिका को नई जनसांख्यिकीय स्थिति के अनुसार बदलने का सुझाव दिया गया है।
- नीति की भाषा बदलने की सिफारिश: सरकारी नीति दस्तावेजों से प्रजनन दर घटाने, जनसंख्या नियंत्रण और जनसंख्या स्थिरीकरण जैसी भाषा हटाने की सिफारिश की गई है।
क्या ईएसी परिवार नियोजन खत्म करने की बात कर रहा है?
नहीं। रिपोर्ट ने इस अंतर को स्पष्ट रूप से बताया है। रिपोर्ट परिवार नियोजन को स्वास्थ्य, बच्चों के बीच अंतर रखने और व्यक्तिगत पसंद के लिए जरूरी मानती है। इसका सुझाव गर्भनिरोधक सेवाओं को खत्म करना नहीं है।
रिपोर्ट का मुख्य तर्क यह है कि परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण एक ही चीज नहीं हैं। उसके मुताबिक बदलती जनसांख्यिकीय स्थिति में स्वास्थ्य और व्यक्तिगत पसंद के लिए परिवार नियोजन जारी रह सकता है, लेकिन जनसंख्या कम करना या प्रजनन दर घटाना सरकारी नीति का मुख्य उद्देश्य बनाए रखना अलग मुद्दा है।
ये स्थिति पहले से है या अभी उत्पन हुई है?
भारत में आजादी के बाद गरीबी का एक लंबा दौर देखा गया। 1950 में भारत की आबादी लगभग 36 करोड़ थी। इसी दौरान देश में कम संसाधनों के बीच जनसंख्या विस्फोट हुआ, जिससे देश की आबादी तेजी से बढ़ने लगी और 1970 तक यह 54 करोड़ का आंकड़ा पार कर गई। इसका असर यह हुआ कि 1970 के दशक में भारत सरकार और नीति निर्माताओं ने इसे अत्याधिक आबादी की समस्या के तौर पर चिह्नित करना शुरू किया, जिनके लिए संसाधनों की कमी एक बड़ा मुद्दा बनता चला गया। उस समय सरकार का मानना था कि एक अपेक्षाकृत गरीब देश के लिए इतनी बड़ी आबादी का प्रबंधन करने के लिए संसाधन कम पड़ जाएंगे।
इसके बाद भारत में जनसंख्या विस्फोट की चिंताएं और उसे नियंत्रित करने के प्रयास शुरू हो गए। जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए सरकार की ओर से कई बड़े कदम उठाए गए, जिनमें लोगों की जबरन नसबंदी करने का एक संक्षिप्त लेकिन बहुत ही विवादास्पद अभियान भी शामिल था। हम दो, हमारे दो जैसे जनसंख्या नियंत्रण अभियान के जरिए सरकार ने परिवार नियोजन का संदेश फैलाने की कोशिश शुरू कर दीं। इन अभियानों का मकसद कम शिक्षित समूहों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता बढ़ाना रहा।
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 इसी सोच का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। उस समय भारत की कुल प्रजनन दर 3.2 थी। 2013 में यह 2.3 और 2024 में 1.9 रह गई। यानी जिस समय यह नीति बनाई गई थी, उस समय भारत की जनसांख्यिकीय स्थिति और आज की स्थिति में काफी बदलाव आ चुका है।
क्या पहले भी भारत की घटती प्रजनन दर पर किसी ने चिंता जताई है?
भारत की गिरती प्रजनन दर पर उद्योगपति एलन मस्क ने द इकोनॉमिस्ट की एक रिपोर्ट साझा करते हुए चिंता जताई थी। 6 जून को उन्होंने एक्स पर कहा कि भारत की जन्म दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे चली गई है। उन्होंने यह भी कहा कि सबसे अधिक शिक्षित लोगों में यह स्थिति कई साल पहले ही आ गई थी।