ग्रेटर नोएडा में बस हादसे में नौ लोगों की मौत हो गई। स्लीपर बसों की सुरक्षा एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। सड़क पर चलने वाली बस में आग लगना अपने आप में बड़ा खतरा है। वहीं, स्लीपर बसों की बनावट और उनमें किए जाने वाले बदलाव कई बार इस खतरे को और बढ़ा देते हैं। आग लगने के बाद यात्रियों के पास बचने के लिए बहुत कम समय होता है।
संकरी गलियां, एक के ऊपर एक बनी बर्थ, कम जगह, बंद या अवरुद्ध आपातकालीन रास्ते और खराब वायरिंग आग को कुछ ही समय में पूरे वाहन में फैलने का मौका दे सकते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस बस में यात्री रातभर सफर करते हैं, क्या उसमें आग लगने की स्थिति में उनके पास सुरक्षित तरीके से बाहर निकलने का पर्याप्त इंतजाम होता है। बसों में आग लगने के मामलों में मौतों की संख्या अधिक होने के कारण अब बसों के निर्माण, फिटनेस, वायरिंग और फायर सेफ्टी मानकों पर फिर सवाल उठ रहे हैं। आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
स्लीपर बस में आग लगने पर खतरा इतना ज्यादा क्यों बढ़ जाता है?
1.वायरिंग से कितना खतरा?
मूल वाहन निर्माता बिजली के भार को सुरक्षित तरीके से बांटने के लिए आधुनिक वायरिंग सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर बस बॉडी तैयार करने वाले कई बार सस्ते और कम गुणवत्ता वाले पुर्जों का इस्तेमाल करते हैं। तार गर्म होने पर उनकी इंसुलेशन परत जल सकती है। इसके बाद चिंगारी निकलने लगती है और आग वायरिंग के रास्ते बस के दूसरे हिस्सों तक तेजी से पहुंच सकती है।
2. स्थानीय स्तर पर क्यों बदली जाती हैं बसें?
कई आग की घटनाओं में शामिल स्लीपर बसें कारखाने से स्लीपर बस के रूप में तैयार नहीं होतीं। सामान्य बस या कोच को रजिस्ट्रेशन के बाद स्थानीय स्तर पर स्लीपर बस में बदला जाता है। इस दौरान अतिरिक्त बर्थ और दूसरी सुविधाएं जोड़ने से मूल डिजाइन में बदलाव हो जाता है।
3. आपातकालीन उपकरणों की क्या कमी?
स्थानीय बॉडी बिल्डरों द्वारा तैयार की गई बसों में कई बार शीशा तोड़ने के लिए आपातकालीन हथौड़े, फायर अलार्म और आग बुझाने या नियंत्रित करने वाली प्रणालियां पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं होतीं।
4. संकरी जगह और ज्यादा बर्थ क्यों?
स्लीपर बस में सीटों की जगह बर्थ होती हैं। एक के ऊपर एक बनी बर्थ, संकरी गलियां और कम ऊंचाई वाली जगह यात्रियों की आवाजाही मुश्किल बनाती है। आग लगने पर यात्री तेजी से खड़े होकर बाहर नहीं निकल पाते और कई बार उन्हें बर्थ के बीच से रेंगकर निकलना पड़ सकता है।
5. आपातकालीन निकास पर क्या सवाल उठे?
नियमों के अनुसार स्लीपर बसों में कई आपातकालीन निकास होने चाहिए, लेकिन कुछ कस्टमाइज्ड बसों में रजिस्ट्रेशन के बाद अतिरिक्त बर्थ लगाने के लिए पीछे के निकास को अवरुद्ध कर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में आग लगने पर यात्रियों के लिए बाहर निकलने का रास्ता बेहद सीमित हो जाता है।
6. आग का फैलाव की रफ्तार क्यों बढ़ जाती?
बस में वायरिंग, फोम और दूसरे ज्वलनशील सामान मौजूद होने पर आग तेजी से फैल सकती है। अगर आग वायरिंग नेटवर्क तक पहुंच जाए तो कुछ ही मिनट में पूरा वाहन इसकी चपेट में आ सकता है।
7. फंसे यात्रियों की मुश्किल क्या?
अगर बाहर निकलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं है तो यात्री एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पहुंच ही नहीं पाते। रात के सफर में सो रहे यात्रियों के लिए खतरा और बढ़ जाता है, क्योंकि उन्हें आग लगने का पता चलने और प्रतिक्रिया देने में समय लग सकता है।
बसों के लिए कौन-कौन से सुरक्षा मानक होते हैं और सवाल कहां उठ रहे हैं?
- भारत में बसों के निर्माण और अग्नि सुरक्षा के लिए कई मानक बनाए गए हैं। इनमें एआईएस-052 बस बॉडी से जुड़ा मानक है, एआईएस-119 स्लीपर बसों के लिए है, जबकि एआईएस-134 आग का पता लगाने और आग पर काबू पाने वाली प्रणालियों से जुड़ा है।
- इन मानकों में बस की बनावट और सुरक्षा से जुड़े नियम तय किए गए हैं। समस्या सिर्फ नियम बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें जमीन पर लागू कराने की है। तकनीकी विशेषज्ञों के मुताबिक कई जगह अनुपालन कागजों तक सीमित रह जाता है। स्थानीय बॉडी बिल्डर ऐसे पुर्जों और सामान का इस्तेमाल कर सकते हैं जो लंबे समय तक गर्मी और बिजली के भार को सहन नहीं कर पाते।
- फोम जैसे ज्वलनशील पदार्थ भी जोखिम बढ़ा सकते हैं। 2022 से 2024 के बीच नियमों में ऐसा बदलाव आया था, जिसके तहत मान्यता प्राप्त बॉडी बिल्डरों को खुद प्रमाणित करने की अनुमति दी गई थी। इसके चलते क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय यानी आरटीओ की नियमित भौतिक जांच पर निर्भरता कम हुई और अपलोड किए गए प्रमाणपत्रों पर ज्यादा भरोसा किया गया।
- बाद में यह व्यवस्था वापस बदल दी गई, लेकिन सवाल यह है कि जिन कमियों को उस दौरान नजरअंदाज किया गया, उनका पता अब भी कितनी मजबूती से लगाया जा रहा है। आरटीओ को हर दो साल में फिटनेस प्रमाणपत्र जारी करना होता है और वाहन के डिजाइन में गड़बड़ी की पहचान करनी होती है।
- प्रशिक्षित इंजीनियरों की कमी भी बड़ी समस्या है। कई राज्यों में तकनीकी पद खाली होने के कारण क्लेरिकल स्टाफ को निरीक्षण की जिम्मेदारी दिए जाने की बात सामने आई है। ऐसे में इलेक्ट्रिकल सिस्टम और फायर सेफ्टी जैसी तकनीकी चीजों की जांच कितनी प्रभावी होगी, यह अपने आप में बड़ा सवाल है।
क्या बसों की फिटनेस जांच में भी बड़ी कमी रह जाती है?
बसों की सुरक्षा सिर्फ उनके निर्माण तक सीमित नहीं है। बस सड़क पर उतरने के बाद उसकी नियमित जांच भी उतनी ही जरूरी है। वाहनों में अनधिकृत बदलाव, अतिरिक्त बर्थ, बंद किए गए आपातकालीन रास्ते, खराब वायरिंग या अग्निशमन उपकरणों की कमी जैसी चीजें समय रहते पकड़ी जानी चाहिए। लेकिन निगरानी की व्यवस्था कमजोर होने पर ऐसी खामियां लंबे समय तक बनी रह सकती हैं। बस ऑपरेटरों और बॉडी बिल्डरों से जुड़े लोगों ने एक और समस्या की ओर ध्यान दिलाया है।
कुछ वाहन अरुणाचल प्रदेश या नगालैंड जैसे राज्यों में पंजीकृत होते हैं, लेकिन हजारों किलोमीटर दूर दूसरे राज्यों में चलते हैं। ऐसी स्थिति में उनके वास्तविक फिटनेस परीक्षण और स्थानीय निगरानी को लेकर सवाल खड़े होते हैं। यानी जिस राज्य में वाहन चलता है, वहां उसकी निगरानी सीमित हो सकती है और जिस राज्य में उसका पंजीकरण है, वहां से दूरी बहुत ज्यादा हो सकती है।
हाल की घटनाओं के बाद सड़क परिवहन मंत्रालय की एक हितधारक बैठक में कस्टमाइज्ड स्लीपर बसों पर पूरी तरह रोक लगाने और केवल मूल वाहन निर्माता यानी ओईएम द्वारा बनाई गई बसों को अनुमति देने के विकल्प पर विचार किए जाने की बात भी सामने आई है। चीन ने भी 2012 में कई घातक हादसों के बाद सभी तरह की स्लीपर बसों की बिक्री पर रोक लगा दी थी। भारत में सवाल यह है कि क्या केवल नियमों को सख्त करना पर्याप्त होगा या बसों की वास्तविक जांच और सड़क पर उनके संचालन की निगरानी भी उतनी ही मजबूत करनी होगी।
बस हादसों में सबसे ज्यादा नुकसान कौन से यात्रियों को?
हाल की बस आग की घटनाओं में प्रभावित यात्रियों का एक बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों का बताया गया है, जिनके पास महंगी बसों का विकल्प नहीं होता या लंबी दूरी के लिए ट्रेन में कन्फर्म टिकट नहीं मिल पाता। ऐसे यात्री रातभर का सफर पूरा करने के लिए स्लीपर बस चुनते हैं और यह भरोसा करते हैं कि वाहन सुरक्षित है। लेकिन अगर बस में आग लगने पर बाहर निकलने के रास्ते ही सीमित हों, आपातकालीन उपकरण मौजूद न हों और वायरिंग या ज्वलनशील सामग्री आग को तेजी से फैलाने में मदद करे, तो कुछ ही समय में सामान्य यात्रा जानलेवा स्थिति में बदल सकती है।
राजस्थान में हाल की घटनाओं के बाद परिवहन विभाग ने निजी ऑपरेटरों और बस बॉडी बनाने वालों की जांच कड़ी करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इनमें फिटनेस, फायर सेफ्टी सिस्टम और बिना अनुमति किए गए बदलावों पर ध्यान दिया जा रहा है। लेकिन किसी एक घटना के बाद कुछ दिनों की सख्ती से समस्या खत्म नहीं होगी। बसों की फिटनेस जांच लगातार होनी चाहिए, प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारियों की कमी दूर करनी होगी और यह देखना होगा कि रजिस्ट्रेशन के बाद बस में कोई ऐसा बदलाव तो नहीं किया गया है जिससे यात्रियों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाए। स्लीपर बसों में अतिरिक्त बर्थ लगाकर ज्यादा यात्रियों को बैठाने की कोशिश अगर आपातकालीन रास्तों को ही कम कर दे, तो यह सुविधा नहीं बल्कि गंभीर सुरक्षा जोखिम बन सकती है।
नियमों का पालन कौन कराएगा?
- ग्रेटर नोएडा की घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि बसों की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियम जमीन पर कितने प्रभावी तरीके से लागू हो रहे हैं। किसी बस में आग लगने की वास्तविक वजह जांच से ही तय होगी, लेकिन ऐसे हादसों ने स्लीपर बसों की बनावट, स्थानीय स्तर पर किए जाने वाले बदलाव, वायरिंग, ज्वलनशील सामग्री, आपातकालीन निकास, फायर अलार्म, आग बुझाने वाली व्यवस्था और फिटनेस जांच जैसे मुद्दों को सामने ला दिया है।
- यात्रियों की सुरक्षा के लिए केवल कागज पर मानक होना पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि बस सड़क पर उतरने से पहले और उसके बाद नियमित जांच में उन सभी मानकों को पूरा करती हो। खास तौर पर ऐसी बसों में जहां अतिरिक्त बर्थ लगाकर मूल डिजाइन बदला गया है, वहां आपातकालीन रास्तों और फायर सेफ्टी की जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर बस में आग लगती है तो यात्री कितनी जल्दी बाहर निकल सकते हैं।
- दरवाजे खुलेंगे या नहीं, आपातकालीन निकास तक पहुंच होगी या नहीं, शीशा तोड़ने के लिए उपकरण होंगे या नहीं और आग फैलने से पहले यात्रियों को चेतावनी देने वाली व्यवस्था काम करेगी या नहीं। इन सवालों के जवाब केवल हादसे के बाद नहीं, बल्कि बस सड़क पर चलने से पहले ही जांचे जाने चाहिए। लगातार और सख्त निगरानी ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि रातभर सफर करने वाला यात्री अपनी जान जोखिम में डालकर बस में न बैठे।