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एसाआईआर पर विवाद: प्रियंका गांधी ने चुनाव आयोग पर उठाए सवाल, क्यों कहा ज्ञानेश कुमार पर दर्ज हो मुकदमा?

Thu, 24 Sep 2026 03:02 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

एसआईआर को लेकर विपक्ष का चुनाव आयोग पर हमला और तेज हो गया है। प्रियंका गांधी ने कहा कि अगर मतदाता सूची में अवैध काम हुआ और सीईसी को इसकी जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई तो क्या उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलना चाहिए? डीके शिवकुमार ने सीईसी के इस्तीफे और एसआईआर रद्द करने की मांग क्यों की? आखिर चुनाव आयोग के अंदर 14 आपत्तियों का विवाद क्या है?

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प्रियंका गांधी, कांग्रेस सांसद - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच विवाद लगातार तेज होता जा रहा है। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने गुरुवार को कहा कि अगर मतदाता सूची में किसी तरह की अवैध कार्रवाई हुई है तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर भी कहा कि अगर उनके सामने कोई अवैध काम हुआ, उन्हें इसकी जानकारी दी गई और फिर भी उसे नहीं रोका गया तो उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलना चाहिए। इसी मुद्दे पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे, एसआईआर रोकने और मतदाता सूची का नए सिरे से पुनरीक्षण कराने की मांग की है।

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प्रियंका गांधी ने केरल के कलपेट्टा में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि चुनाव की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से छेड़छाड़ करना देश और संविधान के खिलाफ गंभीर अपराध है। उन्होंने मतदाता सूची में कथित छेड़छाड़ और बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर सवाल उठाया। उनका आरोप है कि अगर मुख्य चुनाव आयुक्त को अनियमितताओं की जानकारी थी और दूसरे चुनाव आयुक्तों ने भी उन्हें इस बारे में बताया था, फिर भी कार्रवाई नहीं हुई तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अवैध कार्रवाई साबित होने की स्थिति में मुख्य चुनाव आयुक्त को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा कितनी उचित है। हालांकि ये प्रियंका गांधी के आरोप और मांगें हैं, इन्हें चुनाव आयोग की ओर से स्वीकार किया गया तथ्य नहीं माना जा सकता।

क्या चुनाव आयोग के अंदर ही एसआईआर को लेकर मतभेद सामने आए हैं?

  • इस विवाद की एक बड़ी वजह चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेदों को लेकर सामने आई रिपोर्ट है। रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार मतदाता सूची और एसआईआर से जुड़े फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की। 
  • इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाताओं के नाम हटाने और मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल सिस्टम तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं। दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों को कथित तौर पर बिना उनकी जानकारी के लिए जाने पर सवाल उठाए। रिपोर्ट में फॉर्म-6 में किए गए बदलाव और मतदाता सूची के डाटा को ज्यादा केंद्रीकृत किए जाने को लेकर भी आपत्तियों का उल्लेख है।

डीके शिवकुमार ने एसआईआर को लेकर क्या मांग रखी?

  • कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने भी इस मुद्दे पर चुनाव आयोग पर सवाल उठाए और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग की। उन्होंने कहा कि एसआईआर की मौजूदा प्रक्रिया को खत्म किया जाना चाहिए और मतदाता डाटा का नए सिरे से पुनरीक्षण होना चाहिए।
  • शिवकुमार ने कहा कि यह कांग्रेस या भाजपा के वोट का मामला नहीं है, बल्कि हर नागरिक के मतदान के अधिकार से जुड़ा विषय है। उन्होंने फॉर्म-6, 7 और 8 के इस्तेमाल और मौजूदा प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि इसका असर खास तौर पर अशिक्षित और वंचित वर्गों पर पड़ सकता है। उन्होंने पूरे मामले पर संसद जैसे बड़े मंच पर चर्चा और मतदाता डाटा की व्यापक समीक्षा की मांग भी की।

चुनाव आयोग और विपक्ष के दावों में क्या अंतर है?

  • चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेदों की रिपोर्ट के बाद कहा है कि बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में लिखित टिप्पणियां, सुझाव, तकनीकी सवाल और आंतरिक जांच सामान्य कामकाज का हिस्सा हैं। आयोग का कहना है कि उसके सभी आधिकारिक आदेश और फैसले कानूनी प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं और उन्हें पूरा कानूनी आधार हासिल है। 
  • दूसरी ओर, विपक्षी दल एसआईआर और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस सांसद कल्याण बनर्जी ने भी कहा कि जमीनी स्तर पर लोग चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने आयोग की सफाई को खारिज करते हुए डाटा में कथित हेरफेर और सीमा खन्ना की भूमिका पर भी सवाल उठाए। इस तरह एसआईआर का विवाद अब सिर्फ मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि चुनाव आयोग के अंदर निर्णय लेने की प्रक्रिया, मतदाता अधिकार और उसकी संस्थागत कार्यप्रणाली को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
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