गंगा-ब्रह्मपुत्र और मेघना नदियों के मुहाने पर इस सदी के अंत तक समुद्र का जलस्तर 1.4 मीटर बढ़ जाएगा। इसका असर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और बांग्लादेश पर होगा। इस क्षेत्र में हर वर्ष 3 मिलीमीटर की रफ्तार से जलस्तर बढ़ा है, जो दुनिया में सबसे अधिक है। इसे लेकर अमेरिका के प्रोसिडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस जर्नल में प्रकाशित ताजा शोध रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाले खतरे को लेकर भारत और बांग्लादेश को चेताया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र में करीब 20 करोड़ लोग रह रहे हैं, लेकिन यहां की धरती धीरे-धीरे पानी में समाती जा रही है। इन इलाकों में स्थायी बाढ़ से बचाव के लिए तत्काल कड़े कदम उठाने होंगे। अध्ययन में शामिल फ्रांस के नेशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च (सीआरएनएस) के अनुसार फिलहाल इस क्षेत्र में जलस्तर बढ़ने पर होने वाले असर का अध्ययन नहीं किया गया है। फिर भी ऐसी आशंका है कि इन नदियों के मुहाने पर बसा दो-तिहाई बांग्लादेश और पूर्वी भारत के कई हिस्से जलस्तर की चपेट में आएंगे।
दावे के दो आधार
औसत से 50 प्रतिशत तेज बढ़ रहा जलस्तर : दावे के पीछे क्षेत्रीय स्तर पर लंबे समय किए जलस्तर वृद्धि के आकलन हैं। हर महीने दर्ज इन आंकड़ों के अनुसार यहां लगातार जलस्तर बदल रहा है। साल 1968 से 2012 तक हर साल औसतन तीन मिमी की वृद्धि हुई। यह वैश्विक स्तर पर इसी अवधि में दो मिमी प्रतिवर्ष बढ़े समुद्र जलस्तर से 50 प्रतिशत अधिक है।
एक साल में सात मिमी जमीन पानी में गई : इस मुहाने पर 1993 से 2012 के बीच जमीन के पानी में जाने की गति एक मिमी से सात मिमी प्रतिवर्ष रही। वैज्ञानिकों के अनुसार ढाका में हो रहे अध्ययन इस गति को एक से दो सेमी प्रतिवर्ष तक आंक रहे हैं।
स्थायी बाढ़ के हालात की आशंका
रिपोर्ट में कहा गया है कि जमीन के पानी में डूबने की गति जलवायु परिवर्तन पर बनी सरकारों की समिति के आकलन से कहीं तेज है। इससे लोगों के जीवन पर होने वाले असर को समझने के लिए विस्तृत अध्ययन की सिफारिश भी की गई है। हालांकि अभी तक यह आकलन नहीं हुआ है कि कितने लोगों पर इसका क्या असर होगा। मानसूनी बाढ़ की चपेट में आते रहे इस क्षेत्र में समुद्र का जलस्तर बढ़ने से स्थायी बाढ़ के हालात बन सकते हैं।