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Expert View: फीकी पड़ी ब्रांड मोदी की चमक, पिछड़कर भी उभरे अखिलेश

Thu, 09 Mar 2017 08:07 PM IST
सुदीप ठाकुर
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अखिलेश-मोदी की मुलाकात से पहले चढ़ा सियासी पारा
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अतीत में कई बार गलत साबित होने के बावजूद एक्जिट पोल को लेकर दिलचस्पी कायम है, क्योंकि वास्तविक नतीजे भले ही इनसे मेल न खाएं, मगर कुछ रुझान का अंदाजा तो हो ही जाता है।
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पांच राज्यों को विभिन्न खबरिया चैनलों के एक्जिट पोल में सर्वाधिक दिलचस्पी यदि किसी राज्य को लेकर थी, तो वह उत्तर प्रदेश ही था, जहां 403 सीटें हैं। टाइम्स नाऊ, इंडिया टीवी, एबीपी और इंडिया न्यूज के एक्जिट पोल ने भाजपा और उसके सहयोगी दलों को सर्वाधिक सीटें मिलने का अनुमान तो व्यक्त किया है, मगर सिर्फ टाइम्स नाऊ के सर्वे में ही उसे बहुमत मिलता दिखाया गया है।मगर सारे एक्जिट पोल में भाजपा सबसे आगे, उसके बाद समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन और तीसरे नंबर पर बसपा को दिखाया गया है।
 
भाजपा यूपी में भले ही आगे दिख रही हो, मगर सारे एक्जिट पोल का औसत बता रहा है कि वह 180-190 सीटों के बीच बहुमत से पिछड़ जाएगी। यानी वह अपने दम पर सरकार बनाती नहीं दिख रही है। इसका यह भी मतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दर्जन से अधिक रैलियां भी सरकार बनाने लायक लहर नहीं पैदा कर सकी हैं। यदि यही नतीजे होते हैं, तो इसे इस तरह भी पढ़ा जाना चाहिए कि ब्रांड मोदी की चमक फीकी पड़ी है, क्योंकि भाजपा यदि 180 सीटों पर सिमटती है, तो उसका काम अन्य दलों से नहीं चलेगा, उसे बसपा की ओर हाथ बढ़ाना ही होगा। इसके बाद यह भी संभव है कि नोटबंदी को क्रांतिकारी कदम बताने वाले लोग भी स्वीकार करें कि इससे भाजपा को नुकसान हुआ।
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अखिलेश यादव, नरेंद्र मोदी, मायावती, राहुल गांधी
 
एक्टिज पोल पर यकीन करें, तो इसका मतलब यह भी है कि यूपी को अखिलेश और राहुल का साथ बहुत पसंद नहीं आया। इससे अखिलेश के कांग्रेस के साथ गठबंधन करने और उसे सौ सीटें देने के निर्णय पर सवाल उठेंगे। इसके बावजूद अखिलेश की राजनीति पर बहुत फर्क पड़ेगा ऐसा नहीं लगता, क्योंकि वह अभी पैंतालीस साल के भी नहीं हुए हैं। सपा के घरेलू झगड़े के बाद उन्होंने अकेले अपने दम पर चुनाव लड़कर जता दिया है कि उनमें विपक्ष की खाली जगह को भरने की प्रतिभा और हौसला, दोनों है। यदि सपा-गठबंधन की सरकार नहीं बन पाती है, तो अखिलेश जल्द ही राज्यसभा के रास्ते से संसद में नजर आ सकते हैं।
 
एक्जिट पोल में सर्वाधिक नुकसान किसी को होता दिख रहा है, तो वह बसपा है। त्रिकोणीय संघर्ष में बहन मायावती कोई करिश्मा नहीं कर पाईं और ऐसा लगता है कि बसपा अपने परंपरागत बीस-इक्कीस फीसदी वोट में कुछ भी जोड़ नहीं सकी है। उसके पास सत्ता तक पहुंचने की एक ही स्थिति दिख रही है, वह यह कि भाजपा बहुमत से पीछे हो और उसकी ओर हाथ बढ़ाए।
 
वैसे यूपी में सबसे बड़ा उलटफेर यह भी हो सकता है कि बबुआ अखिलेश और बुआ मायावती हाथ मिला लें!
 
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मोदी, राहुल, अखिलेश
यूपी के नतीजों को खासतौर से राहुल गांधी के एक और परीक्षण के तौर पर भी देखा जाएगा। यदि कांग्रेस पिछली बार के बराबर 28 सीटें भी हासिल नहीं कर पाती है, तो राहुल के खिलाफ कांग्रेस के भीतर से भी आवाज उठ सकती है। हालांकि इस पार्टी का तौर-तरीका ऐसा है कि पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के भरोसे मिलती जीत को भी राहुल और सोनिया के खाते में डाल दिया जाएगा। लेकिन तमाम चैनलों के पंजाब के एक्जिट पोल में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच कांटे की टक्कर जैसी स्थिति दिख रही है। कांग्रेस पंजाब के लिए सांत्वना पुरस्कार की तरह है, मगर यदि आम आदमी पार्टी वहां सरकार बना लेती है, तो सबकी नजर अरविंद केजरीवाल के अगले कदम पर होगी, जिनकी नजर गुजरात पर है।
 
वैसे कांग्रेस के लिए एकाधिक एक्जिट पोल का यह नतीजा भी 11 मार्च तक के लिए राहत दे सकता है कि उत्तराखंड में वह भाजपा से थोड़ी ही पीछे है, बल्कि एकाध सर्वे में तो दोनों के बीच कांटे की टक्कर बताई गई है।
 
गोवा में, जैसा कि एक्जिट पोल दिखा रहे हैं, भाजपा सत्ता में लौट सकती है, तो इसका श्रेय भले ही पार्टी प्रधानमंत्री मोदी को दे, मगर इसके पीछे कई लोकल फैक्टर जिम्मेदार हैं। अलबत्ता मणिपुर में भाजपा की जीत इस पार्टी के पूर्वोत्तर की योजना के अनुरूप हो सकती है, जहां वह लंबे समय से पैर पसारने की कोशिश कर रही है।
  
पांच राज्यों के चुनावों के एक्जिट पोल का सार यही है कि बिना लहर के भी भाजपा आगे दिख रही है। मोदी ने जिस तरह से इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया, नतीजे उसके अनुरूप नहीं दिख रहे हैं। राहुल गांधी एक बार खुद को साबित करने में फिर नाकाम दिख रहे हैं। पिछड़ने के बावजूद अखिलेश नेता बनकर उभरे हैं। और पंजाब में जीत मिल गई तो, अरविंद केजरीवाल सबसे बड़े विजेता बनकर उभरेंगे और आप विपक्ष की गोलबंदी की धुरी बन सकती है।
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