पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे (सेवानिवृत्त) ने सोमवार को कहा कि यह एक गलत धारणा है कि रक्षा पर खर्च देश के वित्त पर बोझ है और कहा कि यह वास्तव में अच्छे रिटर्न के लिए एक निवेश है। कोल्हापुर में मराठी दैनिक सकल की वर्षगांठ पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि हमेशा भारत जैसे विकासशील देश में रक्षा पर कितना खर्च करना है और विकास कार्यों में कितना पैसा लगना है इसके बीच बहस होगी।
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रक्षा पहली प्राथमिकता, नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
नरवणे ने कहा कि कितना खर्च किया जा सकता है? इस पर बहस हो सकती है, लेकिन रक्षा पहली प्राथमिकता है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। हमें अपने देश की रक्षा के लिए क्षमता का निर्माण करना होगा। उन्होंने कहा कि क्षमता और इरादे सिक्के के दो पहलू हैं और इरादे रातोंरात बदल सकते हैं। पूर्व जनरल ने जोर देकर कहा कि कोई व्यक्ति जो मित्र है वह कल दुश्मन बन सकता है, लेकिन क्षमता विकसित होने में समय लगता है। इसे विकसित होने में वर्षों और दशकों लगते हैं और इसलिए हमें उस ताकत को बनाने के लिए निरंतर विकास और निरंतर बजट की आवश्यकता होती है।
यूक्रेन-रूस युद्ध का जिक्र करते हुए नरवणे ने कहा कि यूक्रेन ने राष्ट्रीय सुरक्षा की उपेक्षा की और अब एक कीमत चुका रहा है। नुकसान से उबरने में उसे वर्षों लगेंगे। वास्तव में पुनर्निर्माण की लागत, उन्हें प्राप्त सहायता की अदायगी की लागत परिमाण के क्रम में बहुत अधिक होगी, जो उन्होंने देश की रक्षा पर पर्याप्त रूप से खर्च की थी। अब यह एक ऐसी चीज है जिसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं।
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यह कहते हुए कि यह एक गलत धारणा है कि रक्षा व्यय वित्त पर बोझ है, उन्होंने कहा कि वास्तव में रक्षा पर व्यय एक निवेश है, जिससे आपको अच्छा रिटर्न मिलता है। आपने देखा है कि जब अस्थिरता होती है तो सीधे शेयर बाजार प्रभावित होता है। यदि देश स्थिर हो तो यह विदेशी निवेश को आकर्षित करता है।