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लोकसभा चुनाव 2019: ये पांच राज्य तय करेंगे किसकी बनेगी देश में सरकार

सार

  • उत्तर प्रदेश - 80
  • महाराष्ट्र - 48
  • पश्चिम बंगाल - 42
  • बिहार - 40
  • तमिलनाडु - 39
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एग्जिट पोल - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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लोकसभा सीटों की संख्या के लिहाज से देखें तो भारत के ये पांच राज्य बेहद अहम नजर आते हैं इसलिए जाहिर है कि दिल्ली में सरकार बनाने में इन राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को 71, महाराष्ट्र में 23, पश्चिम बंगाल में 2, बिहार में 22, और तमिलनाडु में 1 सीट मिली थी।

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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2014 के आम चुनाव और 2019 के आम चुनाव में बहुत फर्क है। जानकारों का अनुमान है कि इस बार के लोकसभा चुनाव में पिछली बार के लगभग सारे आंकड़े उलटे-पलटे नजर आएंगे और इसकी कई वजहे हैं। अगर कुछ नहीं बदलेगा तो केंद्र में सरकार बनाने में इन पांच राज्यों का योगदान। अब एक-एक करके सभी पांचों राज्यों की सियासी स्थिति पर नजर डालते हैं।

शुरुआत भारत के मानचित्र में नीचे की ओर या दक्षिण से करते हैं। यानी सबसे पहले बात तमिलनाडु की।

तमिलनाडु

दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य में लोकसभा की 39 सीटें हैं। हालांकि इस बार चुनाव सिर्फ 38 सीटों पर हुआ है क्योंकि वेल्लोर में चुनाव रद्द कर दिया गया था।

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यहां भाजपा ने ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके), डीएमडीके और पाटली मक्कल काची (पीएमके) के साथ गठबंधन किया है। दूसरी तरफ कांग्रेस ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके), मरुमलार्ची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एमडीएमके), विदुथलाई चिरुताइगल काची (वीएसके), सीपीआई और सीपीआई (एम) के साथ मिलकर महागठबंधन किया है।

इन दो महागठबंधनों के अलावा तमिलनाडु में दो नई पार्टियों का उदय हुआ है। जिनमें से एक है फिल्म स्टार कमल हासन की पार्टी 'मक्कल निधि मय्यम' (एमएनएम) और शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरण की पार्टी 'अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम' (एएमएमके)। दिनाकरण ने एआईएडीएमके से अलग होकर ये अलग पार्टी बनाई है।

ये दोनों पार्टियां लोकसभा चुनाव में पहली बार हिस्सा ले रही हैं। दिनाकरण ने सभी निर्वाचन क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं लेकिन ये सभी निर्दलीय उम्मीदवार की तरह चुनाव लड़ रहे हैं क्योंकि चुनाव से पहले तक उनकी पार्टी पंजीकृत नहीं हो पाई थी।

अंग्रेजी अखबार 'द हिंदू' के पत्रकार और तमिलनाडु की राजनीति पर नजर रखने वाले डी. सुरेश कुमार कहते हैं कि तमिलनाडु में भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों की भूमिका बहुत सीमित है। यही वजह है कि इन्हें राज्य में प्रमुख द्रविड़ पार्टियों (एआईएडीएमके और डीएमके) का सहारा लेना पड़ता है। डी. सुरेश का मानना है कि तमिलनाडु में भाजपा के खिलाफ विरोध की लहर तो है ही, इसके साथ ही जयललिता के निधन के बाद एडापडी के। पलानीस्वामी सरकार के खिलाफ भी सत्ताविरोधी लहर है।

डी. सुरेश ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "मौजूदा हालात को देखते हुए लगता है कि तमिलनाडु में इस बार कांग्रेस-डीएमके गठबंधन अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है। शायद वो 25-30 सीट जीत सकते हैं। वहीं एआईएडीएमके-भाजपा गठबंधन को 10-12 सीट जीत सकता है।" पारंपरिक तौर पर देखें तो कन्याकुमारी और कोयंबटूर सीट पर भाजपा की अच्छी पकड़ रही है।

इस बारे में डी. सुरेश कहते हैं, "कन्याकुमारी में भाजपा के एक सांसद है जो वहां मंत्री भी है-पोन राधाकृष्णन। लेकिन इसके बावजूद इस बार कन्याकुमारी में भाजपा मजबूत स्थिति में नहीं है क्योंकि वहां कांग्रेस-डीएमके गठबंधन बहुत मजबूत है। इसके अलावा कन्याकुमारी में पोन राधाकृष्णन के खिलाफ भी सत्ता विरोधी लहर है।"

मछुआरों की नाराजगी ले डूबेगी?

डी. सुरेश के मुताबिक राधाकृष्णन के विरोध की एक वजह ये है कि साल 2017 में यहां आए ओकी चक्रवात में मछुआरों का बहुत नुकसान हुआ था। इसमें कई मछुआरों की मौत भी हुई थी। इसके बाद कन्याकुमारी के लोगों में ये असंतोष फैल गया कि प्राकृतिक आपदा के ऐसे मुश्किल वक्त में भी राधाकृष्णन मछुआरों के लिए केंद्र सरकार और भारतीय तटरक्षक बल से पर्याप्त मदद नहीं मांग पाए।

पोन राधाकृष्णन के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर की दूसरी वजह डी सुरेश ये बताते हैं कि वो कन्याकुमारी में एक बंदरगाह बनवाना चाहते थे और स्थानीय मछुआरा समुदाय इसके पक्ष में नहीं था। यहां के मछुआरों को लगता था कि बंदरगाह की वजह से उनके मछली पकड़ने का काम बुरी तरह प्रभावित होगा।

इसके अलावा, अब तक भाजपा को लग रहा था कि पोन राधाकृष्णन की वजह से हिंदू वोट उसके पक्ष में आएंगे लेकिन कांग्रेस ने एच। वसंत कुमार नाम के रिटेल कारोबारी को कन्याकुमारी से अपना प्रत्याशी बना लिया। वसंत कुमार भी उसी समुदाय (नादर हिंदू) से ताल्लुक रखते हैं जिससे पोन राधाकृष्णन। ऐसे में हिंदू वोटों के बंटने की भी पूरी संभावना है।

एक और अहम बात ये है कि कन्याकुमारी में अल्पसंख्यक वोट भी पर्याप्त संख्या में हैं और उनके ज्यादातर वोटों के डीएमके-कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में जाने का अनुमान है। यानी कुल मिलाकर देखें तो इस बार कन्याकुमारी में भाजपा मजबूत स्थिति में नहीं है। हालांकि डी. सुरेश इस बात से सहमति जरूर जताते हैं कि कोयंबटूर में भाजपा पारंपरिक रूप से मजबूत रही है।

वो कहते हैं, "इसके अलावा डीएमके-कांग्रेस ने कोयंबटूर से सीपीआई (एम) के पीआर नटराजन को अपना प्रत्याशी बनाया है जो पूर्व सांसद रह चुके हैं। दूसरी ओर भाजपा ने सीपी राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार बनाया है। सीपी राधाकृष्णन भी पूर्व सासंद रह चुके हैं। ऐसे में कोयंबटूर में दोनों पक्षों में कड़ी टक्कर होने की उम्मीद है।

हालांकि भाजपा की नोटबंदी और जीएसटी जैसी आर्थिक नीतियां कोयंबटूर में उसके खिलाफ जा सकती हैं।

युवाओं को आकर्षित करते कमल हासन

डी. सुरेश कहते हैं, "चूंकि कोयंबटूर एक औद्योगिक शहर है और यहां हजारों छोटे उद्योग हैं। नोटबंदी और जीएसटी की वजह से यहां के कारोबारियों को काफी नुकसान हुआ है। इसलिए मुमकिन है कि इस बार भाजपा के कुछ वोट कट जाएं लेकिन इसके बावजूद कोयंबटूर में कांटे की टक्कर देखने को मिल सकती है।" डी. सुरेश के मुताबिक भाजपा को रामनाथपुरम सीट पर फायदा मिल सकता है।

भाजपा ने यहां से नायनर नागेंद्रन को अपना प्रत्याशी बनाया है जो एआईएडीएमके सरकार में मंत्री रह चुके हैं। बाद में वो एआईएडीएम से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए थे। वहीं, कांग्रेस ने इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) से नवाज कनी को उम्मीदवार बनाया है, जिन्हें वहां बहुत ज्यादा मजबूत नहीं माना जा रहा है। इसलिए, फिलहाल रामनाथपुरम में भाजपा फायदे में दिख रही है।

अगर बात कमल हासन की पार्टी की करें तो डी। सुरेश मानते हैं कि शहरी इलाकों के युवाओं और महिलाओं के एक वर्ग का रुझान कमल हासन की पार्टी की ओर रहा है। ये वो तबका है जो एआईएडीएमके-भाजपा गठबंधन को वोट नहीं देना चाहता था। ऐसे में कुछ लोगों ने डीएमके-कांग्रेस गठबंधन के बजाय कमल हासन की पार्टी को तरजीह दी।

डी। सुरेश कुमार कहते हैं, "चूंकि ये पार्टी बिल्कुल नई है इसलिए इनके आधार के बारे में बहुत ज्यादा अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। इसके लिए हमें नतीजों का इंतजार करना होगा। शहरी इलाकों में इनका थोड़ा असर जरूर होगा। हालांकि इतना असर भी नहीं होगा कि वो जीत सके लेकिन वो बड़ी पार्टियों के वोट काटें इसकी पूरी संभावना है।"

वहीं, दिनाकरण की पार्टी की बात करें तो वो एआईएडीएमके के वोट जरूर बांटेगी। डी। सुरेश के मुताबिक कावेरी-डेल्टा इलाके में दिनाकरण बहुत मजबूत हैं क्योंकि उनकी बुआ शशिकला मन्नारगुडी कस्बे से हैं इसलिए वहां उनका आधार मजबूत है।

इसके अलावा दक्षिण तमिलनाडु में भी दिनाकरण ठीकठाक स्थिति में हैं। अनुमान लगाया जा रहा है कि दिनकरण को 6-8% वोट मिल सकते हैं क्योंकि कुछ अल्पसंख्यक वोट भी उनके खाते में आ सकते हैं।

नाराजगी के पीछे NEET

डी. सुरेश कहते हैं कि पिछले दो-तीन साल में यानी जयललिता के निधन के बाद तमिलनाडु की पार्टियों ने वहां के लोगों के मन में ये धारणा बिठा दी है कि भाजपा तमिलनाडु के खिलाफ है। इसके प्रमुख कारणों में से एक है-नीट (NEET) परीक्षा।

तमिलनाडु में तकरीबन 10 साल पहले मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षा का सिस्टम खत्म कर दिया गया था। तमिलनाडु में छात्रों को 12वीं के नंबरों के आधार पर ग्रैजुएशन में दाखिला मिलता था।

इसके बाद जब NEET लागू किया गया तो यहां कहा जाने लगा कि इससे ग्रामीण इलाकों के छात्रों को अच्छे कॉलेज मिलना मुश्किल होगा। उस समय भाजपा नेता निर्मला सीतारमण (जो खुद तमिलनाडु से हैं) ने कहा था कि राज्य को एक साल के लिए NEET से राहत मिलेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

इस बीच दलित परिवार की लड़की अनीता ने खुदकुशी कर ली। अनीता वो लड़की थी, जिन्होंने NEET के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। इस घटना के बाद तमिलनाडु का एक वर्ग भाजपा से खफा हो गया।

इसके अलावा केंद्र की कई परियोजनाओं को लेकर भी तमिलनाडु में खासी नाराजगी है- मसलन जैसे हाइड्रो कार्बन प्रोजेक्ट और सेलम-चेन्नई कॉरिडोर प्रोजेक्ट, जिस पर अदालत ने फिलहाल रोक भी लगाई हुई है।

इन परियोजनाओं को लेकर तमिलनाडु में नकारात्मक माहौल है क्योंकि यहां कि जनता को लगता है कि इन सबसे खेती और स्थानीय कारोबार पर बुरा असर पड़ेगा।

डी सुरेश कहते हैं कि एक और अहम बात ये है कि चूंकि अभी न तो करुणानिधि जीवित हैं और न जयललिता इसलिए तमिलनाडु की जनता को लगता है कि मोदी की अगुवाई वाली भाजपा राज्य में अपनी विचारधारा थोप रही है।

मिसाल के तौर पर जब जयललिता जीवित थीं तब उन्होंने खाद्य सुरक्षा विधेयक। उज्ज्वला योजना और जीएसटी का विरोध किया था लेकिन उनके निधन के बाद ये सभी योजनाएं तमिलनाडु में लागू कर दी गईं। इसलिए लोगों को लगता है कि केंद्र सरकार तमिलनाडु के साथ 'बिग ब्रदर' वाला रवैया अपना रही है।

डी सुरेश कहते हैं कि, "इन सभी वजहों को ध्यान में रखते हुए ही भाजपा ने इस बार एआईएडीएमके से गठबंधन किया क्योंकि पिछले बार उसे नोटा से भी कम वोट मिले थे। इस बार इतनी खराब हालत तो बिल्कुल नहीं होगी लेकिन बेहतर स्थिति में डीएमके-कांग्रेस गठबंधन ही दिख रहा है।"

पश्चिम बंगाल

कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद चुनाव के विभिन्न चरणों के दौरान पश्चिम बंगाल में हिंसा कायम रही है। अंग्रेजी अखबार 'द टेलीग्राफ' के वरिष्ठ पत्रकार तपस चक्रवती मानते हैं कि बंगाल में इस बार लड़ाई 'मोदी बनाम ममता' है।

ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) साल 2011 में सत्ता में आई थी। शुरुआत में सियासी हिंसा वामदलों और टीएमसी कार्यकर्ताओं के बीच होती थी लेकिन पिछले दो साल से संघर्ष टीएमसी और भाजपा कार्यकर्ताओं में होने लगा है। ये इसी बात का संकेत है कि सत्ता की लड़ाई अब भाजपा और टीएमसी में है।

तपस चक्रवर्ती के मुताबिक पश्चिम बंगाल की राजनीति में दक्षिणपंथी विचारधारा या भाजपा का असर उस वक्त दिखना शुरू हुआ जब ममता बैनर्जी पर अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के तुष्टिकरण के आरोप लगे। इससे बंगाल के बहुसंख्यक समाज का एक तबका ममता से दूर होने लगा। इसी का फायदा उठाकर भाजपा कार्यकर्ता यहां आकर पार्टी का आधार बनाने की कोशिशों में लग गए।

इतना ही नहीं, भाजपा ने बांग्लादेश सीमा से लगे जिलों में बांग्लादेश से आए हिंदुओं का समर्थन करना शुरू कर दिया।

भाजपा के लिए सहानुभूति

इन सबका नतीजा बंगाल में 2016 में हुए पंचायत चुनाव के नतीजों में साफ देखने को मिलता है। पंचायत चुनावों में भाजपा के वोट प्रतिशत में अच्छी बढ़त मिली थी। पंचायत चुनाव में वैसे तो टीएमसी क्लीन स्वीप करने में कामयाब रही थी लेकिन साथ ही भाजपा सीपीआई (एम) को पछाड़कर दूसरे नबंर पर काबिज हो गई थी।

तपस चक्रवर्ती कहते हैं कि पंचायत चुनाव के साथ ही टीएमसी और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच हिंसा का दौर भी शुरू हो गया था। उस समय से दोनों पार्टियों के बीच हिंसा की जो शुरुआत हुई वो इस लोकसभा चुनाव में भी कायम है। भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले और उनकी हत्या की वजह से भी बंगाल के एक वर्ग में भाजपा के लिए सहानुभूति पैदा हुई।

तपस के अनुसार पश्चिम बंगाल की राजनीति पर नजर रखने वाले विश्लेषकों के अनुमान और अब तक के रुझान को देखें तो इस बार भाजपा 8-10 सीटें जीतने में कामयाब हो सकती है या कम से कम इतना तो तय है कि उसे पश्चिम बंगाल में पिछले लोकसभा चुनाव से ज्यादा सीटें मिलेंगी। हालांकि दावा वो करीब 23 सीटें जीतने का कर रही है।

तपस कहते हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल इसलिए भी ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा चाहती है कि वो उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-आरलडी गठबंधन की वजह से होने वाले नुकसान की भरपाई पश्चिम बंगाल से कर ले।

चेन्नई-मुंबई भागते कोलकाता के नौजवान

पश्चिम बंगाल की जनता मुद्दों के बारे में पूछने पर तपस कहते हैं कि शिक्षित बंगाली युवाओं को मनचाहा रोजगार न मिलने की वजह से उनका बैंगलोर, चेन्नई और मुंबई जैसे शहरों में पलायन एक बड़ा मुद्दा है।

तपस के अनुसार तृणमूल कांग्रेस के शासन में आने और वामदलों के पतन की एक बड़ी वजह रोजगार का अभाव था। कम्युनिस्ट पार्टियों के शासन में कुछ समय तक कृषि की स्थिति तो ठीक रही लेकिन धीरे-धीरे वो भी स्थिर होती चली गई। रोजगार और विदेशी निवेश का बुरा हाल तो था ही।

हालांकि ममता बनर्जी भी रोजगार और विदेशी निवेश लाने में कुछ खास सफलता नहीं पा सकीं। वो कुछ देशों की यात्राओं पर जरूर गईं लेकिन वहां से ठोस निवेश नहीं ला पाईं। लोगों में अब भी इस बात को लेकर निराशा है। हालांकि लोगों की इन तमाम शिकायतों के बावजूद ममता बनर्जी अब भी वहां अपना प्रभुत्व रखने में कामयाब हैं क्योंकि उनकी पार्टी का कैडर बहुत मजबूत है।

तपस चक्रवर्ती बताते हैं, "टीएमसी का कैडर कितना मजबूत हो गया है इसका सबूत है विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में उसके छात्र संगठनों की मौजूदगी। वाम छात्र संघ स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफाई) तो जैसे कहीं गुम ही हो गया है।"

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा भी अपना कैडर दिन प्रतिदिन और मजबूत कर रही है लेकिन अब भी उसकी पहुंच हिंदी-भाषियों तक ही ज्यादा है। जानकार ये भी मानते हैं कि भाजपा के इन कोशिशों का नतीजा इस लोकसभा चुनाव में कम लेकिन अगले विधानसभा चुनाव में ज्यादा देखने को मिलेगा।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में शिवसेना और भाजपा में आखिरी वक्त तक 'तू-तू-मैं-मैं' होती रही लेकिन आखिकार दोनों पार्टियों ने फिर गठबंधन कर लिया। दूसरी तरफ राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) ने चुनाव में हिस्सा तो नहीं लिया लेकिन उन्होंने रैलियां खूब कीं और रैलियों 'ए लावा तो रे वीडियो' कहकर मोदी सरकार के दावों की धज्जियां उड़ाते रहे।

इस बारे में मराठी भाषा के लोकप्रिय अखबार 'लोकसत्ता' के संपादक गिरीश कुबेर का मानना है कि 2019 के चुनाव में असल मायनों में सबसे बुरी हार शिवसेना की होगी।

गिरीश कहते हैं, "पिछले लोकसभा चुनाव में शिवसेना-भाजपा गठबंधन को 41 सीटें मिली थीं। मुझे लगता है कि इस बार ये आंकड़ा सिमटकर 30-32 पर आ जाएगा। शिवसेना ने जिस तरह आखिरी वक्त तक भाजपा के प्रति जैसा कटु बर्ताव दिखाया और अंत में उसी से हाथ मिला लिया, इससे मतदाताओं में अच्छा संदेश तो नहीं ही गया है।"

गिरीश कुबेर इस बार महाराष्ट्र में राज ठाकरे को 'एक्स-फैक्टर' मानते हैं।

एक्स फैक्टर: राज ठाकरे

उन्होंने बीबीसी से कहा, "हर चुनाव में कोई न कोई ऐसी पार्टी होती है जिसके बारे में ये अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि वो आगे क्या करेगी। महाराष्ट्र में ये एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे ने किया। उन्होंने 11-12 रैलियां कीं और हर रैली में मोदी सरकार के दावों को झुठलाने वाले वीडियो दिखाते रहे। इससे भाजपा के कुछ वोट तो जरूर कट गए होंगे।"

गिरीश के मुताबिक महाराष्ट्र में शिवसेना की स्थिति बिगड़ने और राज ठाकरे के उभरने से राज्य की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका और दिलचस्प हो जाएगी। गिरीश कुबेर ये भी मानते हैं कि चुनाव से कुछ वक्त पहले ही नेशनल कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) प्रमुख ने जिस तरह स्थानीय मुद्दों को उठाना शुरू किया, उसका असर भी नतीजों में कहीं न कहीं जरूर दिखेगा।

वो कहते हैं, "महाराष्ट्र को हमें दो हिस्सों में बांटकर देखना होगा। राज्य की 30 सीटें ग्रामीण क्षेत्रों में और 18 सीटें पूरी तरह शहरी। मुझे लगता है ग्रामीण इलाकों में एनसीपी के पक्ष में ज्यादा वोट जाएंगे क्योंकि इतने गंभीर कृषि संकट के बावजूद केंद्र सरकार की इन इलाकों के प्रति अनदेखी से लोगों में, खासकर किसानों में नाराजगी है। मुझे हैरत नहीं होगी अगर एनसीपी 10-12 सीटें निकालने में कामयाब हो जाए।"

गिरीश मानते हैं कि चुनावी नतीजों के बाद एनसीपी की महाराष्ट्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका तो रहेगी ही, केंद्र के लिए भी उसकी अनदेखी करना मुश्किल होगा। भाजपा का 'राष्ट्रवाद' और 'हिंदुत्व' एजेंडा महाराष्ट्र में कितना सफल रहा? गिरीश कुबेर मानते हैं कि शहरी लोगों के बीच ये एजेंडा काफी हद तक स्वीकार्य रहा।

वो कहते हैं, "शहरी मध्यमवर्गीय तबका इन राष्ट्रवाद और हिंदुत्व जैसे मुद्दों से अछूता नहीं रहा। उनमें 'पुलवामा', 'बालाकोट एयर स्ट्राइक' और 'पाकिस्तान को सबक सिखाने' की खासी चर्चा रही लेकिन गांवों में लोगों पर खेती, मुआवजा, कर्ज माफी, पानी और रोजगार जैसे अहम बुनियादी मुद्दे हावी रहे।"

राष्ट्रवाद तो ठीक लेकिन रोजी-रोटी का क्या?

गिरीश कहते हैं, "मैंने चुनाव से पहले चुनाव के दौरान महाराष्ट्र के कई शहरी और ग्रामीण इलाकों का दौरा किया। इस तरह मैं महसूस कर पाया कि शहरी और ग्रामीण लोगों के मुद्दों में गहरा विभाजन है। महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जहां शहरीकरण खूब हुआ है लेकिन ग्रामीण इलाके भी उतने ही हैं। शहरों से सटे हुए गांव भी हैं। ऐसे में यहां गांवों की अनदेखी करने चुनाव जीत पाना मुश्किल है।"

गिरीश कुबेर पिछले 40 साल में छह-सात संसदीय चुनाव कवर चुके हैं। वो कहते हैं कि 2019 के आम चुनाव में मुद्दों की विभिन्नता इसे इससे पहले के आम चुनावों से अलग करती है। उन्होंने कहा, "मैंने ग्रामीण और शहरी मतदाताओं के बीच मुद्दों का इतना ज्यादा फर्क कभी महसूस नहीं किया। सामाजिक और आर्थिक स्तर पर कुछ ऐसी ही भिन्नता है। ये काफी चौंकाने वाली बात है।"

उत्तर प्रदेश

दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है, ये बात पुरानी भले लगे लेकिन रहेगी हमेशा सच। अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे से लेकर कुंभ और फिर अमेठी, रायबरेली से लेकर लखनऊ, ये सारी हाई प्रोफाइल सीटें लगातार चर्चा का विषय रहती हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से युवा दलित नेता चंद्रशेखर का उभरना, उनकी वाराणसी से चुनाव लड़ने का ऐलान और फिर फैसला बदलना, प्रियंका गांधी वाड्रा का उनसे मिलना, सपा-बसपा का कांग्रेस पर मतदाताओं के बीच भ्रम फैलाने का आरोप और इसी बीच बीएसएफ के पूर्व जवान तेजबहादुर यादव का प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ वाराणसी से चुनाव लड़ने का ऐलान।

सपा द्वारा तेजबहादुर को टिकट दिया जाना, उनका नामांकन रद्द होना और लखनऊ से सपा के टिकट पर शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा को राजनाथ सिंह के खिलाफ मैदान में उतारा जाना। चौंकाने वाले तमाम घटनाक्रमों की ये लिस्ट बहुत लंबी है। लेकिन इन सब घटनाक्रमों में शायद सबसे अहम है समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन।

भाजपा बनाम महागठबंधन

वरिष्ठ पत्रकार और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक पर बारीकियों से नजर रखने वाले महेंद्र प्रताप का मानना है कि सत्ताधारी भाजपा को सपा-बसपा-आरएलडी से कड़ी चुनौती मिल रही है।

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "अब तक का हाल देखकर मुझे लगता है कि यूपी में भाजपा की सीटें लगभग आधी हो जाएंगी। पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति बहुत हद तक जातीय समीकरणों पर चलती है और यहां गठबंधन काफी मजबूत होकर उभरा है।"

अगर बात छोटी पार्टियों की करें तो महेंद्र प्रताप कहते हैं कि इनकी भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी। इसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपना दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) और निषाद पार्टी जैसे दल अगर जीतने की स्थिति में नहीं हैं तो वोटों का बंटवारा करने की स्थिति में तो जरूर हैं।

जातियों पर टिके चुनाव

मुद्दों के सवाल पर महेंद्र प्रताप कहते हैं, "जैसे-जैसे चुनाव बीतते गए वैसे-वैसे उत्तर प्रदेश में मुद्दे गौण होते गए। पहले और दूसरे चरण के चुनाव के दौरान गन्ना किसानों की समस्याओं जैसे मसलों पर बात करने की कोशिश जरूर की गई लेकिन बाद में स्थानीय मुद्दे ग़ायब होते गए और आखिर में चुनाव जातियों पर ही आकर टिक गया।"

उत्तर प्रदेश में इस बार सबसे ज्यादा फायदे में कौन रहेगा? इसके जवाब में महेंद्र प्रताप कहते हैं, "पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली थी। अगर इस बार वो दो सीटें भी जीतती है तो उसके लिए ये बहुत बड़ी जीत होगी। प्रियंका गांधी के आने और राहुल गांधी की सक्रियता के बाद कांग्रेस की भी कुछ सीटें बढ़ने की उम्मीद है। सपा की सीटें बढ़ने की भी उम्मीद जताई जा रही है।"

महेंद्र प्रताप के मुताबिक एक और बात जो इस लोकसभा चुनाव को पिछले लोकसभा चुनावों से अलग बनाती हैं, वो ये है कि इस बार पार्टियों में मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने की पहले जैसी होड़ नहीं दिखी, जबकि उत्तर प्रदेश में तकरीबन 19 फीसदी मुसलमान वोटर हैं।

बिहार

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने बिहार के सिवान और गोपालगंज में दिए अपने एक चुनावी भाषण में कहा, "हम जीतें या हारें, हम देश की सुरक्षा से समझौता नहीं करेंगे।" इससे पहले तक वो शाह हर जगह कहा करते थे, "अबकी बार 300 पार।"

क्या अमित शाह का ये रवैया बिहार में भाजपा की डगमगाती हालत को दर्शाता है? बिहार की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पर नजर रखने वाले प्रोफेसर डीएम दिवाकर इस सवाल का जवाब 'हां' में देते हैं।

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "भाजपा के लिए चीजें पिछली बार की तरह आसान तो नहीं हैं। दूसरी बात ये कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 'विकास' और 'सुशासन' के नाम पर वोट मांगने के लिए जाना जाता है लेकिन दूसरे और तीसरे चरण के बाद वो भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राष्ट्रवाद और पीएम मोदी के नाम पर वोट मांगने लगे जबकि पहले ये कहा जाता था कि देश के बाकी हिस्सों में लोग भले मोदी के नाम पर वोट दें लेकिन बिहार में लोग नीतीश के नाम पर वोट करते हैं। ये स्थिति अब बदल चुकी है।"

इसके अलावा भाजपा के चार ऐसे उम्मीदवार हैं जिन्हें टिकट नहीं मिला है। डीएम दिवाकर के मुताबिक ऐसे लोग 'वोटकटवा' की भूमिका में आ सकते हैं। डीएम दिवाकर मानते हैं कि बिहार में भी सत्ता विरोध लहर का प्रभाव है। इसका सबूत है कि भाजपा नेताओं का अपनी रैलियों और चुनावी भाषणों में 'नोटबंदी' और 'जीएसटी' जैसी योजनाओं का जिक्र न करके 'राष्ट्रवाद' और 'पाकिस्तान में एयरस्ट्राइक' के नाम पर वोट मांगना।
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'तेजस्वी के पक्ष में जा सकते हैं सिंपैथी वोट'

अगर बात लालू यादव की ग़ैर मौजूदगी की करें तो दिवाकर मानते हैं कि इसका नुकसान आरजेडी को होगा लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष ये है कि लोगों के 'सिंपैथी वोट' भी पार्टी को मिल सकते हैं।

दिवाकर कहते हैं, "तेजस्वी ने जिस तरह बिहार की राजनीति में अपनी जगह बनाई है वो शायद इसलिए ही मुमकिन हो पाया है क्योंकि उनके पिता उनके साथ नहीं हैं। अगर लालू बाहर होते तो तेजस्वी इतनी जल्दी परिपक्व नहीं हो पाते और न ही लोग इतनी जल्दी उनके पक्ष में आते।"

अगर बात निषाद समुदाय के नेता और विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के संस्थापक मुकेश सहनी, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) की करें तो प्रोफेसर दिवाकर की राय में इनसे बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।

हां, इन पार्टियों ने ये संदेश जरूर दिया है कि बिहार में सिर्फ मुसलमान या यादव मतदाता ही निर्णायक भूमिका नहीं निभाते बल्कि दूसरी पिछड़ी जातियां और दलित भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

किसानों के बारे में कौन सोचेगा?

मुद्दों के बारे में पूछने पर प्रोफेसर दिवाकर कहते हैं कि बाकी जगहों की तरह बेरोजगारी तो एक यूनिवर्सल मुद्दा है ही इसके अलावा बिहार में दो-तीन और प्रमुख मुद्दे हैं।

प्रोफेसर दिवाकर कहते हैं, "बिहार भयंकर कृषि संकट से जूझ रहा है। इसके अलावा खेती और पशुपालन से जुड़ी दूसरी समस्याएं भी हैं। मिसाल के तौर पर बिहार में मछलियां आंध्र प्रदेश से आयात की जाती हैं जबकि हमारे यहां तालाब और पानी से भरपूर क्षेत्रों की कोई कमी नहीं है। नीतीश कुमार के समय में इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में विकास बेशक हुआ लेकिन रोजगार, खेती और बाकी सुविधाओं के लिए अभी बहुत काम होना बाकी है। इसका अहसास मतदाताओं को बखूबी है।"
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