सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा के आधार पर सरकारी लाभ या उचित मूल्य की दुकान (राशन दुकान) का आवंटन देने से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना असांविधानिक, लैंगिक भेदभाव है। यह समानता तथा भेदभाव-निषेध के सांविधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कुलसुम निशा की याचिका स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट, उपायुक्त और उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) के आदेशों को रद्द कर दिया। इन आदेशों में केवल इस आधार पर उनका दावा खारिज किया गया था कि वह शादीशुदा बेटी हैं।
क्या था मामला?
कुलसुम निशा ने अपनी मां की मृत्यु के बाद राशन दुकान के आवंटन की मांग की थी। उनकी मां उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में उचित मूल्य की दुकान चलाती थीं। उनका आवेदन एक सरकारी आदेश के तहत खारिज कर दिया गया था, जिसमें शादीशुदा बेटियों को परिवार की परिभाषा से बाहर रखा गया था।
कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान की सांविधानिक वैधता की जांच करते हुए कहा कि आश्रित कोटे के तहत दुकान का आवंटन करने का उद्देश्य मृतक डीलर के परिवार को आर्थिक कठिनाई के समय तत्काल राहत देना है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में आश्रित होना, आर्थिक जरूरत, स्थानीय निवास और दुकान चलाने की क्षमता अहम कारक हैं। वैवाहिक स्थिति का इन बातों से कोई तार्किक संबंध नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा बेटियों को इस आधार बाहर रखना गलत और असांविधानिक धारणा है कि विवाह के बाद बेटी अपने मायके के परिवार का हिस्सा नहीं रहती। कोर्ट ने कहा कि शादी बेटी और उसके मायके के बीच संबंध समाप्त नहीं करती और न ही यह मानने का आधार है कि वह अपने परिवार पर निर्भर नहीं हो सकती।
पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति की निर्भरता एक तथ्यात्मक प्रश्न है और इसे केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि योजना में शादीशुदा बेटों को बाहर नहीं रखा गया है। बेटा शादी के बाद भी परिवार का सदस्य माना जाता है, जबकि बेटी को सिर्फ शादीशुदा होने के कारण बाहर कर दिया जाता है।
अदालत ने कहा कि यह भेदभाव उस लैंगिक रूढ़िवादी सोच पर आधारित है, जिसमें माना जाता है कि विवाह के बाद बेटी दूसरे परिवार का हिस्सा बन जाती है और अपने मायके से उसका संबंध खत्म हो जाता है।
ये भी पढ़ें:
डीके शिवकुमार ने साझा किया कर्नाटक के विकास का विजन, कहा- 'युवा युग' की होगी शुरुआत
'ऐसी सोच लैंगिक असमानता को बढ़ावा देती है'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी सोच संविधान में दिए गए समानता के अधिकार के खिलाफ है और यह लैंगिक असमानता को बढ़ावा देती है, जिसे संविधान समाप्त करना चाहता है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने दलील दी थी कि शादीशुदा बेटी स्थानीय निवास की शर्त पूरी नहीं कर सकती। इस पर कोर्ट ने कहा कि स्थानीय निवास एक अलग पात्रता शर्त है और हर मामले में तथ्यों के आधार पर इसकी जांच की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यह मान लेना कि हर शादीशुदा बेटी विवाह के बाद कहीं और रहने लगती है, केवल एक अनुमान है और इसके आधार पर सभी शादीशुदा बेटियों को बाहर नहीं किया जा सकता।