डिप्रेशन का पहला पायदान, जिसे कर दिया जाता है नजरअंदाज
दिल्ली स्थित इबहास सेंटर के मनोचिकित्सक एवं असोसिएट प्रोफेसर ओमप्रकाश का कहना है कि विद्यार्थियों पर पड़ने वाले इस दबाव को सभी नजरअंदाज कर देते हैं। परिवार और स्कूल प्रबंधन भी इसकी भयावह स्थिति को नहीं समझ पाता। विद्यार्थी खुद को हार का चिह्न मानने लगता है। उसे खुद मालूम होता है, लेकिन वह इस धारणा के साथ आगे बढ़ता रहता है कि न तो उसे हार माननी है और न ही इलाज लेना है। इस बाबत वह खुद किसी को कुछ बताना भी नहीं चाहता। ये सभी स्थितियां धीरे धीरे उसे डिप्रेशन के उच्च स्तर तक ले जाती हैं।
सभी को अपने व्यवहार में बदलाव लाना होगा
डॉ. ओमप्रकाश के मुताबिक, विद्यार्थियों को इस स्थिति से बचाने के लिए सभी को अपने व्यवहार मे बदलाव लाना होगा। खासतौर पर मां-बाप को इस दिशा में गंभीरता से सोचना पड़ेगा। अभिभावक अपने बच्चो के लगातार संपर्क में रहें। उन्हें हर तरीके से प्रोत्साहन दें। दबाव या डिप्रेशन का कोई भी लक्ष्ण दिखे तो बिना कोई देरी किए डॉक्टर से संपर्क करें। ऐसे मामलों में काउंसलिंग बहुत काम आती है। अगर स्थिति बिगड़ गई है तो आसानी से दवाओं के द्वारा उसका इलाज किया जा सकता है। डॉ. ओमप्रकाश का मानना है कि ऐसे केस सामने आने का मतलब यह नहीं है किे अभिभावक अपने बच्चों को पूरी छूट दे दें, उनके साथ रोका टोकी न करें। ऐसा नहीं होना चाहिए। देखने में आया है कि बहुत से बच्चे मां-बाप की डांट फटकार के बिना गलत राह पर चले जाते हैं, इसलिए उन पर मां-बाप का सकारात्मक दबाव भी जरूरी है।
विद्यार्थियों की खुदकुशी के मामले में टॉप 10 राज्य
| राज्य |
साल 2014 |
साल 2015 |
साल 2016 |
| बिहार |
79 |
62 |
171 |
| छत्तीसगढ़ |
416 |
730 |
633 |
| गुजरात |
367 |
469 |
556 |
| झारखंड |
142 |
138 |
233 |
| मध्यप्रदेश |
645 |
625 |
838 |
| महाराष्ट्र |
1191 |
1230 |
1350 |
| ओडिशा |
325 |
330 |
390 |
| राजस्थान |
200 |
197 |
221 |
| उत्तर प्रदेश |
252 |
229 |
263 |
| पश्चिम बंगाल |
709 |
676 |
1147 |
नोट: इसके अलावा तमिलनाडू में 2016 के दौरान ऐसे 981 मामले दर्ज किए गए थे। कर्नाटक में 540, केरल में 340, हरियाणा में 155 और तेलंगाना में 349 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की थी।
स्त्रोत: केंद्र सरकार की रिपोर्ट, भारत में दुर्घटना मृत्यु और आत्महत्या।