2010 में जम्मू-कश्मीर सरकार ने बताया था कि घाटी में अभी भी 808 पंडित परिवार रह रहे हैं। इन परिवारों में कुल 3445 सदस्य थे लेकिन समुदाय के दूसरे लोगों को वापस लाने की वित्तीय और अन्य मदद की घोषणाएं नाकाम रहीं। राज्य सरकार की रिपोर्ट के अनुसार, 1989 से 2004 के बीच इस समुदाय के 219 लोग मारे गए।
घर वापसी के लिए सोशल मीडिया पर मुहिम
घाटी से अपने विस्थापन के तीस साल पूरे होने के अवसर पर समुदाय के लोगों ने सोशल मीडिया पर हैशटैग हम आएंगे अपने वतन से एक अभियान शुरू किया। इसमें कश्मीरी पंडित अपने वीडियो बनाकर साझा कर रहे हैं। हम आएंगे अपने वतन जल्द प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘शिकारा’ का संवाद है। समुदाय के लोग उम्मीद जता रहे हैं कि वे लोग एक न एक दिन अपने घर जरूर वापस लौटेंगे।
पिछले साल केंद्र सरकार ने भी जताई थी अपनी प्रतिबद्धता
पिछले साल जुलाई में, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में बताया था कि केंद्र सरकार कश्मीरी पंडितों को घाटी में फिर से बसाने के लिए प्रतिबद्ध है और एक वक्त ऐसा आएगा जब लोग प्रसिद्ध खीर भवानी मंदिर में पूजा कर सकेंगे। माता खीर भवानी मंदिर श्रीनगर के पूर्व में करीब 14 किलोमीटर दूर स्थित है। यह कश्मीरी पंडितों के लिए पवित्र स्थान है।
पिछले साल सितंबर में कश्मीरी पंडितों के एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अमेरिकी शहर हॉस्टन में मुलाकात की थी और राज्य को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद-370 के खात्मे के लिए धन्यवाद दिया था।
राजभवन के बाहर प्रदर्शन, स्थायी पुनर्वास की उठाई मांग
विस्थापन के तीस साल पूरे होने पर कश्मीरी पंडितों ने रविवार को राजभवन के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया। ऑल स्टेट कश्मीरी पंडित कांफ्रेंस (एएसकेपीसी) के बैनर तले अन्य कई संगठनों के प्रतिनिधियों ने कश्मीरी पंडितों को न्याय दिलाने की मांग की।
बाद में कश्मीरी पंडितों की समस्याओं और मांगाें का एक ज्ञापन उपराज्यपाल जीसी मुर्मू को सौंपा गया। प्रदर्शनकारियों ने अनुच्छेद 370 और 35-ए हटाने का स्वागत करते हुए कहा कि विस्थापितों का स्थायी पुनर्वास और न्याय सुनिश्चित किया जाना चाहिए। एएसकेपीसी के अध्यक्ष एडवोकेट रवींद्र रैना ने कहा कि समुदाय अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रह रहा है।