यूपी के गांवों की हालत बहुत खराब है। अधिकतर गांवों में कोरोना मरीजों की जांच से लेकर इलाज तक झोला छाप डॉक्टर कर रहे हैं। वे जहां मोटी कमाई कर रहे हैं, वहीं इलाज के नाम पर लोगों के जान से खिलवाड़ भी कर रहे हैं। कुछ लोगों की मौत भी हो चुकी है।
बनारस में खालिसपुर गांव के प्रभात नारायण पांच दिन तक सर्दी, जुकाम, गले में खरास की शिकायत झेलते रहे। उन्होंने कोरोना जांच के लिए कोशिश की। सफल नहीं हो पाए। अंत में पास की तहसील में एक डॉक्टर ने खून की जांच के आधार पर इलाज शुरू किया।
यही शिकायत सुल्तानपुर में खाजापुर गांव अरुण तिवारी की भी है। अरुण ने किसी तरह डीएम, सीएमओ के यहां शिकायत करके 25 किमी दूर जाकर आरटी-पीसीआर जांच कराई। कोविड पॉजिटिव आ गए। अब ब्लॉक से एक आदमी आता है और दवा का पैकेट फोन पर देकर चला जाता है। अरुण तिवारी बताते हैं कि उनका पूरा इलाज फोन के माध्यम से चल रहा है। वे बताते हैं उनके गांव में इस तरह की बीमारी लिए करीब 20-25 से अधिक लोग अपने घरों में हैं।
कोई डिग्री नहीं, 10 गांवों के सैकड़ों मरीज हैं उनके भरोसे
मसनपुुर के झोलाछाप डॉक्टर विजय कुमार यादव के पास कोई आधिकारिक डिग्री नहीं है, लेकिन फोन पर बताते हैं कि 10 गांवों के सैकड़ों मरीज उनके भरोसे चल रहे हैं। जितना हो पा रहा है, वह दवा देते हैं। तमाम मरीजों को आराम है। विजय यह नहीं बता पाते कि इसमें कितना कोरोना संक्रमित हैं। वह कहते हैं कि गांव वालों के पास न तो 20 किमी दूर जाकर जांच कराने का साधन, हिम्मत है और न ही गांवों में जांच की इस तरह से व्यवस्था है।
कादीपुर, सुलतानपुर में चिकित्सक अजय सिंह का भी यही कहना है। अजय कहते हैं कि सरकारी अस्पताल में थोड़ा सा गिना सामान आता है। टारगेट पहले फिक्स हो जाता है। समझ में नहीं आता कि किस मरीज के साथ क्या व्यवहार किया जाए। कुछ की जांच हो पाती है, अधिकांश अंदाज के आधार पर दवा खा रहे हैं।
झोला छाप से दवा लेने पर तीन की मौत
बदलापुर, जौनपुर में डॉ. शशिधर त्रिपाठी पुराने एमबीबीएस डॉक्टर हैं। घनश्यामपुर के नरेन्द्र बताते हैं कि उनके यहां भीड़ लगी रहती है। डॉ. साहब हर मरीज से पांच गज की दूरी बनाए रखते हैं। सर्दी, खांसी, जुकाम, गले में खरास वालों को खून की जांच कराकर दवा लिख देते हैं। नरेन्द्र बताते हैं उनके गांव में झोला छाप से दवा लेते तीन लोगों की मृत्यु हो चुकी है। कारण क्या है पता नहीं।
बनारस में जितेन्द्र सिंह रहते हैं। जितेन्द्र सिंह गहमर, गाजीपुर के रहने वाले हैं। बताते हैं उनके गांव की स्थिति बहुत बदहाल है। शंकर प्रताप सिंह प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक हैं। पंचायत चुनाव के दौरान संक्रमित हो गए। बताते हैं तीन बार जाने के बाद जांच नहीं हो पाई तब उन्होंने खुद ही लक्षण और व्हाट्सअप पर लोगों से मिली दवा की पर्ची के आधार पर दवा शुरू कर दी। देसी और अंग्रेजी दवा दोनों। अब आराम है।
पीएमओ से संपर्क की कोशिश नाकाम
केन्द्रीय स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों से बार बार संपर्क की कोशिश भी नाकाम साबित हो रही है। आईसीएमआर की कोविड टास्क फोर्स से जुड़े चिकित्सक सूत्र का कहना है कि गांवों की स्वास्थ्य दशा तो राम भरोसे चल रही है। वह बताते हैं कि पलवल, फरीदाबाद के पास के कुछ गांवों में बहुत चिंताजनक स्थिति देखने में आई।
संसाधन उपलब्ध कराना राज्य सरकार का काम
केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधिकारियों का कहना कि गांव में न्यूनतम संसाधन उपलब्ध कराना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। उ.प्र. के कोविड टास्क फोर्स के एक सदस्य का कहना है कि अब एक दिन में राज्य साधन नहीं विकसित कर सकता। हम जो कर पा रहे हैं, कर रहे हैं।
गांवों में कोरोना पहुंचना चिंताजनक
उनका कहना है कि इसके लिए गांव के लोग भी कम जिम्मेदारी नहीं हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स) के महामारी विभाग के चिकित्सक डा. आनंद कृष्णन कहते हैं कि गांवों की ताजा स्थिति का केवल आकलन भर किया जा सकता है। वास्तविकता तो शायद सरकार को भी पता नहीं है। डॉ. कृष्णन कहते हैं कि गांवों में कोरोना पहुंच चुका है। यह आने वाले समय के लिए बहुत चिंता की बात है।