सार्वजनिक कंपनी के प्रबंध निदेशक शर्मा ने कहा कि अनुमान है कि कचरा प्रबंधन से सालाना हमें 60-70 करोड़ रुपये की आय होगी। इसके अलावा लोगों को रोजगार मिलेगा। खास बात ये है कि इसे पूरे काम में एक प्रतिशत भी प्रदूषण नहीं होगा। किसी तरह के केमिकल या भट्ठी का प्रयोग इस यूनिट में नहीं किया जा रहा है, बल्कि पहले चरण में पानी फिर चुंबक के जरिए दुर्लभ तत्वों को अलग किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि कचरा प्रबंधन का पहला ट्रायल खेतड़ी, राजस्थान में तांबा अयस्क यूनिट में किया गया था। लेकिन वहां पानी की समस्या के मद्देनजर कचरा प्रबंधन की यूनिट को मध्य प्रदेश में स्थापित किया गया। शर्मा ने स्पष्ट किया कि कचरे से दुर्लभ तत्वों को निकलाने की प्रक्रिया में पानी बर्बाद नहीं होता है। उसी पानी को दोबारा शोधन के दौरान प्रयोग में लाया जाता है। पानी के बाद चुंबकीय मशीन सभी तत्वों को अलग करती है। मैग्नेटाइट को लौह पदार्थों के काम में लाया जाता है। जबकि सिलिका शीशा बनाने में काम आती है।
गौरतलब है कि एचसीएल इस यूनिट से निकलने वाली रेत, सीलिका, मैग्नेटाइट, चांदी और सोना की बिक्री करेगा। पहले प्रति दस हजार टन और फिर प्रसंस्करण में मात्रा को बढ़ाया जाएगा। ऐसे में एचसीएल तांबा निकलाने की अपनी सभी यूनिट के कचरे का प्रबंधन कर पर्यावरण को संरक्षित करेगा। साथ ही आय को बढ़ाकर सार्वजनिक उपक्रम की क्षमता को मजबूत करेगा।