रांची के मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण ने अपने फैसले में मृतक की ‘भविष्य में आय की हानि’ का आकलन 20 हजार रुपये प्रति माह पर किया और उस आधार पर मुआवजे की रकम 30 लाख रुपये तय की थी। झारखंड हाईकोर्ट ने अपने फैसले में मुआवजे की राशि को 30 लाख से घटाकर 15 लाख रुपये कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भले ही वास्तविक आय का कोई दस्तावेजी सबूत न हो लेकिन मोटर दुर्घटना मामले में बीमा दावों पर विचार करते समय मृत व्यक्ति की कमाई की क्षमता पर विचार किया जा सकता है। उक्त मामले में मृतक कंप्यूटर इंजीनियर के परिवार के पास उसके 10 हजार रुपए प्रति माह कमाने का प्रमाण था। परिवार का दावा था कि वह इसके अलावा 10 हजार रुपये कमाता था लेकिन इस दावे को लेकर उनके पास दिखाने के लिए कोई दस्तावेजी सबूत नहीं था।
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रांची के मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण ने अपने फैसले में मृतक की ‘भविष्य में आय की हानि’ का आकलन 20 हजार रुपये प्रति माह पर किया और उस आधार पर मुआवजे की रकम 30 लाख रुपये तय की थी। झारखंड हाईकोर्ट ने अपने फैसले में मुआवजे की राशि को 30 लाख से घटाकर 15 लाख रुपये कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा, इस कोर्ट की राय है कि आय के संबंध में बिना किसी सुबूत के और 20 हजार रुपये प्रति माह की कमाई के मौखिक बयान के आधार पर न्यायाधिकरण द्वारा मुआवजे की रकम तय की गई थी, जो उचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में प्रतिवादी-बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया गया जो यह दर्शाता हो कि मृत्यु के समय मृतक की वास्तविक आय 20 हजार रुपये प्रति माह थी। जस्टिस एमआर शाह की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, यह मान लिया जाए कि अपीलकर्ता के पास मृतक की कमाई 20 हजार प्रति माह होने का कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं है लेकिन यह देखते हुए कि वह कंप्यूटर इंजीनियर था, इसलिए उसमें कमाने की क्षमता थी। ऐसे में यह समझा जा सकता है कि वह कम से कम 20 हजार रुपये प्रति माह कमाई कर सकता था। यह कहते हुए सुप्रीम के हाईकोर्ट के फैसले को दरकिनार कर दिया।