वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को बड़ा एलान करते हुए कई सरकारी बैंकों के विलय की घोषणा कर दी। इस घोषणा के बाद देश में केवल 12 सरकारी बैंक रह जाएंगे। बैंकों के विलय के समय उनके कर्मचारियों की नौकरियों में छंटनी की किसी भी आशंका को भी सरकार ने नकारा है। लेकिन वित्त मंत्री की इस घोषणा के तुरंत बाद ही बैंक कर्मचारी संघों ने इसके विरोध की घोषणा कर दी।
इन संघों का कहना है कि सरकार इस विलय के पीछे के असली मकसद को साफ नहीं कर रही है। सच्चाई यह है कि बैंकों के विलय के बाद अनेक शाखाएं बंद होंगी और इनमें नौकरियां खत्म होंगी। संस्थाओं का आरोप है कि इस विलय की घोषणा के पहले उनकी कोई राय नहीं ली गई।
दिल्ली प्रदेश बैंक वर्कर्स ऑर्गनाइजेशन के जनरल सेक्रेटरी अश्विनी राणा ने कहा कि बैंकिंग संस्थानों के विलय के पीछे मूल विचार कार्यबल को घटाकर लागत कम करना और मुनाफा बढ़ाना होता है। ऐसे में सरकार का यह दावा कि इसके बाद नौकरियों की संख्या में कमी नहीं आएगी, भ्रामक है। उन्होंने कहा कि कोई भी बैंक विलय नहीं चाहता। बल्कि वह स्वतंत्र रूप से ज्यादा काम करने का इच्छुक होता है।
उन्होंने कहा कि अभी 23-24 अगस्त को स्टेट लेवल बैंकिम कमेटी की बैठक हुई थी। इस बैठक में उनसे बैंकों को मजबूत करने और लोन देने की क्षमता बढ़ाने के संदर्भ में विचार मांगे गए थे। बैठक में किसी भी बैंकिंग संस्थान ने बैंकों के विलय का विचार नहीं रखा था। ऐसे में अचानक बैंकों के विलय का प्रस्ताव कैसे और किसकी सलाह पर लिया गया, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए।