1975 में भारत में जब इमरजेंसी लगी तो उस दौरान संजय गांधी पर कई तरह के आरोप लगे थे। कथित तौर पर हुई ज्यादतियां, जबरन नसबंदी, सरकारी काम में दखल, मारुति उद्योग विवाद वगैरह-वगैरह। हालांकि इमरजेंसी के बाद जब उनके खिलाफ कानूनी मामले चले तो उन्हें जेल जाना पड़ा एक फिल्म के चक्कर में।
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संजय गांधी पर आरोप था कि इमरजेंसी के दौरान 1975 में बनी फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' के प्रिंट कथित तौर पर उनके कहने पर जलाए गए। ये उन्हीं पर बनाई गई पॉलिटिकल स्पूफ फिल्म थी।
दरअसल इमरजेंसी के इर्द गिर्द बनी निर्देशक मधुर भंडारकर की फिल्म 'इंदु सरकार' को लेकर कुछ कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने पिछले दिनों अराजकता की है। उन्हें कई कार्यक्रम भी रद्द करने पड़े। इन घटनाओं के बाद से ही इमरजेंसी, राजनीति और फिल्मों को लेकर सवाल मन में घूम रहे हैं। शोले से लेकर कई कम चर्चित फिल्में इमरजेंसी का शिकार रही हैं।
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किस्सा कुर्सी का
- फोटो : BBC
फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' जनता पार्टी सांसद अमृत नाहटा ने बनाई थी जिसके नेगेटिव जब्त कर लिए गए थे और बाद में कथित तौर पर जला दिए गए। इमरजेंसी के बाद बने शाह कमीशन ने संजय गांधी को इस मामले में दोषी पाया था और कोर्ट ने उन्हें जेल भेज दिया हालांकि बाद में फैसला पलट दिया गया। फिल्म में संजय गांधी और उनके कई करीबियों का स्पूफ दिखाया था। शबाना आजमी गूँगी जनता का प्रतीक थी। उत्पल दत्त गॉडमैन के रोल में थे और मनोहर सिंह एक राजनेता के रोल में थे जो एक जादुई दवा पीने के बाद अजब गजब फैसले लेने लगते हैं।
1978 में इसे दोबारा बनाया गया। लेकिन संजय गांधी को जेल पहुँचाने वाली फिल्म जब रिलीज हुई तो कब आई और कब गई किसी को पता भी नहीं चला। इसी तरह 1978 में आईएस जौहर की फिल्म 'नसबंदी' भी संजय गांधी के नसबंदी कार्यक्रम का स्पूफ था जिसमें उस दौर के बड़े सितारों के डुप्लिकेटों ने काम किया था। फिल्म में दिखाया गया कि किस तरह से नसंबदी के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को पकड़ा गया। फिल्म का एक गाना था 'गांधी तेरे देश में ये कैसा अत्याचार' जिसके बोल कुछ यूँ थे "कितने ही निर्देोष यहाँ मीसा के अंदर बंद हुए, अपनी सत्ता रखने को जो छीने जनता के अधिकार, गांधी तेरे देश में ये कैसा अत्याचार"।
इसे इत्तेफाक कहिए या सोचा समझा कदम कि ये गाना किशोर कुमार ने गाया था। दरअसल इमरजेंसी के दौरान किशोर कुमार उस वक्त बहुत नाराज हो गए थे जब उन्हें कांग्रेस की रैली में गाने के लिए कहा गया। प्रीतिश नंदी के साथ छपे एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "मैं किसी के आदेश पर नहीं गाता।" अंजाम तो सभी जानते हैं कि बाद में किशोर कुमार के गानों पर ऑल इंडिया रेडियो पर बैन लगा दिया गया था। नसबंदी फिल्म का एक और गाना था- 'क्या मिल गया सरकार इमरजेंसी लगा के' जिसे मन्ना डे और महेंद्र कपूर ने गाया था।
शोले
- फोटो : BBC
कई मशहूर फिल्म को भी इमरजेंसी के कारण मुश्किल उठानी पड़ी थी। फिल्म शोले के आखिरी सीन में असल में रमेश सिप्पी ने दिखाया था कि ठाकुर कील लगे जूतों से गब्बर को रौंद देता है। लेकिन वो इमरजेंसी का दौर था और सेंसर बोर्ड के नियम काफी सख्त थे। वो नहीं चाहता था कि ऐसा कुछ भी दिखाया जाए जिससे लगे कि कि कोई भी कानून अपने हाथ में ले सकता है। सेंसर बोर्ड चाहता था कि गब्बर को पुलिस के हवाले कर दिया जाए। लेकिन रमेश सिप्पी अड़ गए। अनुपमा चोपड़ा की किताब 'शोले द मेकिंग ऑफ ए क्लासिक' में वो लिखती हैं, "सिप्पी परिवार ने कई जान पहचान वालों तक अपनी बात पहुँचाई। बाप-बेटे आपस में भी उलझ बैठे। एक समय रमेश सिप्पी ने फिल्म से अपना नाम हटाने का भी मन बनाया। वकील रहे जीपी सिप्पी ने बेटे को समझाया कि इमरजेंसी में कोर्ट जाने का कोई फायदा नहीं।
रिलीज की तारीख तय थी -15 अगस्त 1975 और 20 जुलाई हो चुकी थी। संजीव कुमार सोवियत संघ में थे। वे तुरंत भारत लौटे। आखिरी सीन दोबारा शूट हुआ, डबिंग और मिक्सिंग हुई। सेंसर ने रामलाल का वो सीन भी काट दिया जिसमें वो जोर जोर से ठाकुर के उन जूतों में कील ठोकता है जिससे ठाकुर गब्बर को मारने वाला था, क्योंकि रामलाल आँखों में विद्रोह की झलक थी।
इस तरह इमरजेंसी के दौरान शोले तैयार हुई लेकिन ये वो फिल्म नहीं थी जो रमेश सिप्पी बनाना चाहते थे। गुलजार की फिल्म आंधी का किस्सा तो जगजाहिर है। कई लोगों आरोप था ये इंदिरा गांधी की जिंदगी पर आधारित थी और इमरजेंसी के दौरान बैन कर दी गई थी।
इमरजेंसी के दौरान कई कलाकार ऐसे भी थे जो फिल्मों के जरिए विरोध के अलावा बात आगे तक ले गए। देव आनंद तो इतने नाराज थे कि उन्होंने नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया नाम की राजनीतिक पार्टी तक बनाई थी। शिवाजी पार्क में इसका बड़ा जलसा भी हुआ। देव आनंद अपनी ऑटोबायोग्राफी में लिखते हैं, "मैं समझ गया था कि मैं उन लोगों के निशाने पर हूँ जो संजय गांधी के करीब हैं।"
अब इमरजेंसी हटने के 40 साल बाद फिर इसी मुद्दे के इर्द गिर्द घूमती मधुर भंडारकर की फिल्म आ रही है। इसे अजीब इत्तेफाक या आयरनी ही कहेंगे कि मधुर भंडारकार के मुताबिक मौजूदा सेंसर बोर्ड ने उन्हें जो शब्द हटाने के लिए कहा है उनमें शामिल हैं, आरएसएस, जयप्रकाश नारायण, पीएम, आईबी, कम्यूनिस्ट और किशोर कुमार। मानो इस बात का डर हो कि किशोर कुमार फिर से जिंदा हो गाने लगेंगे कि 'गांधी तेरे देश में ये कैसा अत्याचार'। और जिन लाइनों को हटाने के लिए कहा है वो हैं- 'अब देश में गांधी के मायने बदल गए हैं', 'मैं तो 70 साल का बूढ़ा हूँ मेरी नसबंदी क्यों करवा रहे हो।'
कई देशों में राजनीतिक हस्तियों और घटनाओं पर फिल्में बनना आम बात है। लेकिन भारत में आज भी सियासतदानों और सिनेमा के बीच असहज सा रिश्ता बना हुआ है। इमरजेंसी के 42 साल बाद भी एक राजनीतिक फिल्म में गांधी, जयप्रकाश और किशोर कुमार जैसे नामों के खौफ का साया है।