एल्गार परिषद-माओवादी लिंक मामले में गिरफ्तार कार्यकर्ता गौतम नवलखा के अमेरिका में गिरफ्तार किए गए पाकिस्तानी आईएसआई एजेंट से संबंध थे। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने सोमवार को यह खुलासा किया है। एनआईए ने गौतम नवलखा की जमानत का विरोध करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में यह दावा किया है। जांच एजेंसी ने इसमें यह भी कहा कि नवलखा ने ऐसे काम किए हैं जिनका भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, एकता और संप्रभुता पर सीधा प्रभाव पड़ा है।
एनआईए के वकील संदेश पाटिल ने सोमवार को जस्टिस ए एस गडकरी और पीडी नाइक की खंडपीठ को नवलखा की जमानत याचिका के विरोध में अपना जवाब दाखिल करने के बारे में जानकारी दी। पीठ ने फिलहाल याचिका को सुनवाई के लिए 27 फरवरी को सूचीबद्ध किया है।
एनआईए ने किया दावा
एनआईए ने अपने हलफनामे में दावा किया कि ISI एजेंट गुलाम नबी फई द्वारा आयोजित कश्मीरी अमेरिकी परिषद सम्मेलन में बोलने के लिए नवलखा ने तीन बार संयुक्त राज्य अमेरिका का दौरा किया था। इतना ही नहीं नवलखा गुलाम नबी फई के नियमित संपर्क में भी थे। एनआईए ने कहा कि गुलाम नबी फई को जुलाई 2011 में ISI और पाकिस्तान सरकार से धन लेने के लिए अमेरिकी एजेंसी FBI द्वारा गिरफ्तार किया गया था। जिसके बाद नवलखा ने क्षमादान के लिए गुलाम नबी फई के मामले में अमेरिकी अदालत के न्यायाधीश को एक पत्र भी लिखा था।
आईएसआई जनरल से की थी मुलाकात
एजेंसी ने आगे दावा किया, 'आईएसआई के निर्देश पर गुलाम नबी फई के जरिए गौतम नवलखा ने एक पाकिस्तानी आईएसआई जनरल से भी मुलाकात की थी। यह गुलाम नबी फई और पाकिस्तानी आईएसआई के साथ उनकी सांठगांठ और मिलीभगत को दर्शाता है। '
माओवादी गतिविधियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका
एनआईए ने आरोप लगाया कि नवलखा को सरकारी बलों के खिलाफ बुद्धिजीवियों को एकजुट करने और सीपीआई (माओवादी) के कामों को अंजाम देने के लिए कैडरों की भर्ती करने जैसे कार्य सौंपे गए थे। एजेंसी ने दावा किया कि नवलखा न केवल एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन का समर्थन कर रहा थे, बल्कि सीपीआई (माओवादी) की गतिविधियों को आगे बढ़ाने में उसकी सक्रिय भूमिका थी। इन गतिविधियों का उद्देश्य सरकार को उखाड़ फेंकना था।
गौरतलब है कि स्वास्थ्य के आधार पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद नवलखा वर्तमान में जेल में रहने के बजाय घर में नजरबंद किए गए हैं।
क्या है एल्गार मामला
बता दें कि एल्गार मामला 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित एल्गार परिषद सम्मेलन में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों से जुड़ा हुआ है। पुलिस का दावा है कि इन भड़काऊ भाषणों के कारण ही पुणे जिले में कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा भड़क गई थी। पुलिस ने यह भी दावा किया था कि इस सम्मेलन को माओवादियों का समर्थन प्राप्त था।