वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने शनिवार को चुनावी बॉन्ड को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे बडा घोटाला करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि इनका इस्तेमाल अनुबंधों के लिए रिश्वत देने, केंद्रीय चांज एजेंसियों से लोगों को बचाने, नीतियों में हेरफेर करने और दवा नियामकों को प्रभावित करने के लिए किया गया था। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय दायर याचिका पर जल्द ही सुनवाई करेगा। याचिका में कॉरपोरेट और सियासी दलों के बीच कथित रूप से एक-दूसरे को लाभ पहुंचाने के लिए किए गए समझौतों की एसआईटी से जांच कराने की मांग की गई है।
भूषण ने आरोप लगाया कि चुनावी बॉन्ड का इस्तेमाल (कंपनियों द्वारा) अनुबंध हासिल करने, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से खुद को बचाने और दवा नियामकों से खुद को बचाने के लिए किया गया। उन्होंने कहा, कुल 16,500 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड में से आधे भाजपा और बाकी तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस जैसे दलों को मिले हैं। हालांकि, जो लोग शासन नहीं कर रहे हैं, उन्हें कोई पैसा नहीं मिला।
उन्होंने आगे कहा, 500 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड जारी किए गए, जिसके परिणामस्वरूप 5 लाख करोड़ रुपये के अनुबंदों को मंजूरी दी गई। इसके अलावा, सीबीआई, ईडी या आयकर विभाग की छापेमारी में सामिल कंपनियों ने 2,500 करोड़ रुपये के बॉन्ड भी उपलब्ध कराए थे। दिलचस्प बात यह है कि बॉन्ड जारी होने के बाद इन कंपनियों की जांच अचानक बंद हो गई। भूषण ने आरोप लगाया कि यह पैसा या तो वसूली के रूप में लिया गया या हफ्ता के रूप में लिया गया।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एक दूरसंचार कंपनी ने भाजपा को सौ करोड़ रुपये से ज्यादा के चुनावी बॉन्ड जारी किया और उनकी ओर से आयात नीति को बदल दिया गया। कुछ फार्मा कंपनियों ने भाजपा और कुछ अन्य सरकारों को 1000 करोड़ रुपये क बॉन्ड जारी किए। कुछ फार्मा कंपनियों ने भाजपा और कुछ राज्य सरकारों को 1,000 करोड़ रुपये के बॉन्ड जारी किए।