वरिष्ठ अधिवक्ता सुमित वर्मा का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड की प्रक्रिया को रद्द करके बहुत ही न्याय संगत और तर्कसंगत फैसला दिया है। उनका कहना है कि देश के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि जो व्यक्ति चंदा दे रहा है कहीं उसके लिए सरकार कोई फेवर तो नहीं कर रही है। सूचना के अधिकार के तहत अभी तक इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी नहीं मिलती थी। इसलिए इस पर सवाल उठते थे। कानूनी मामलों के जानकारों का मानना है कि इलेक्टोरल बॉन्ड के रद्द किए जाने से चुनावी माहौल में सियासी दलों के लिए एक बड़ा झटका तो माना ही जा रहा है। वरिष्ठ अधिवक्ता सुमित वर्मा कहते हैं कि चुनावी दौर में राजनीतिक दलों को चंदा तो चाहिए ही होता है, ऐसे माहौल में इलेक्टोरल बांड की व्यवस्था का रद्द किया जाना सभी सियासी दलों के लिए झटका है। अब सरकार को चाहिए कि चुनावी चंदे के लिए नई और पारदर्शी व्यवस्था बनाए।
इलेक्टोरल बांड पर पाबंदी लगने वाले आदेश के बाद सियासी दलों में भी हलचल मच गई। वरिष्ठ अधिवक्ता अवधेश सहाय कहते हैं कि इससे हर उस सियासी दल को झटका लगा है, जिसे इलेक्टोरल बांड से चुनावी चंदा मिलता था। वह कहते हैं कि सरकार ऐसी पारदर्शी व्यवस्था लाए, जिसमें चंदा देने वाले की पूरी जानकारी जनता को भी होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरीके से अगले कुछ हफ्तों के भीतर चंदा देने वालों के नाम उजागर करने को कहा है, उससे तस्वीर और भी साफ हो जाएगी। इस दौरान इस बात का पता चलेगा कि बीते कुछ सालों में किस औद्योगिक घराने से लेकर किस व्यक्ति ने कौन सी पार्टी को सबसे कितना चंदा दिया है। अवधेश सहाय कहते हैं कि चंदा देने की व्यवस्था कानूनी रूप से पारदर्शी व्यवस्था के माध्यम से अवश्य लागू होनी चाहिए। क्योंकि लोकसभा के चुनाव नजदीक आ रहे हैं। इसलिए नई पारदर्शी व्यवस्था जितनी जल्दी लागू हो सकेगी उससे चुनावों में। इस्तेमाल होने वाले काले धन पर रोक भी उतनी ही तेजी से लगेगी।