2019 आम चुनाव से पहले कई सियासी हलचलें होनी हैं और हो भी रही हैं। ऐसी ही एक हलचल चेन्नई में दो दिन पहले रविवार को हुई। डीएमके के कार्यक्रम में पार्टी प्रमुख एम के स्टालिन ने राहुल गांधी को 2019 में पीएम पद का उम्मीदवार बता दिया। स्टालिन ने कहा कि अगर विपक्षी पार्टियां सरकार बनाती है तो कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाए। इधर यह बयान आया, उधर भाजपा के खिलाफ एकजुटता की कसमें खा रहे विपक्षी दलों में खलबली मच गई। बयान पर बयान आना शुरू हो गए।
2019 आम चुनाव में भाजपा-कांग्रेस के बीच घमासान तो होगा ही, तीसरे मोर्चे और महागठबंध की कवायद भी जोर पकड़ेगी। महागठबंधन को लेकर सियासी हलचल तो 6 महीने पहले ही शुरू हो चुकी है। हालांकि बीच-बीच में ऐसे बयान और वाकये सामने आ जाते हैं जो बताते हैं कि इसका परवान चढ़ पाना इतना आसान नहीं है। राहुल को लेकर दिया गया बयान इसी कयास को आगे बढ़ाता दिखता है।
स्टालिन के बयान पर जिस तेजी से सियासी प्रतिक्रियाएं सामने आईं उससे संकेत मिल गया कि 2019 के रण में कैसा युद्ध होगा। दोस्ती की कसमें खाने वाले नेता आपस में उलझेंगे और कई दुश्मन दोस्त बन जाएंगे। जरा इन बयानों को गौर कीजिए और अंदाजा लगाइए कि स्टालिन के बयान ने कैसी खलबली मचाई।
एनसीपी-टीएमसी को एतराज
शरद पवार की पार्टी एनसीपी ने कांग्रेस को पुराना वादा याद दिलाते हुए कहा कि कांग्रेस ने कहा है कि आम चुनाव के बाद अगर विपक्ष सरकार बनाती है तो विपक्षी पार्टियां प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार चुनेंगी, इसलिए इसे लेकर अभी बहस करने की कोई जरूरत नहीं है। एनसीपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता नवाब मलिक ने कहा कि कांग्रेस ने खुद ही घोषणा की है कि लोकसभा परिणाम के बाद ही इस पर (प्रधानमंत्री उम्मीदवार) पर फैसला होगा।
स्टालिन के बयान ने तृणमूल कांग्रेस में भी खलबली मचाई। पार्टी ने कहा कि इस तरह का बयान समय से पूर्व दिया गया बयान होगा। तृणमूल कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि लोक सभा चुनाव परिणाम के बाद विपक्षी पार्टियों द्वारा चर्चा के बाद ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम पर फैसला लिया जाना चाहिए। किसी भी तरह के एकपक्षीय फैसले से गलत संदेश जाएगा। पीएम उम्मीदवार पर अभी कोई भी फैसला समय पूर्व होगा और यह विपक्षी खेमे को बांट सकता है।
वामदल भी बिगड़े
वहीं, वामदलों ने भी इस पर तुरंत अपनी प्रतिक्रिया जताई। चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद के दावेदार की घोषणा करने की पहल को वामदलों ने गैरजरूरी बताया। वामदलों ने कहा कि ऐसी किसी पहल गैरजरूरी और विपक्ष की एकजुटता के लिए नुकसानदायक है। माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को सत्ता से बाहर करने के साझा लक्ष्य को लेकर सभी विपक्षी दलों की एकजुटता प्राथमिक जरूरत है। इसके लिए एकजुट विपक्ष की ओर से चुनाव के पहले ही प्रधानमंत्री पद के चहरे की घोषणा करना जरूरी नहीं है। वहीं भाकपा के महासचिव एस सुधाकर रेड्डी ने भी चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद के चेहरे की घोषणा को विपक्षी दलों की एकजुटता के लिए नुकसानदायक बताया।
कई दलों के एतराज के बीच संदेश साफ है। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जबरदस्त जीत का श्रेय राहुल को ही जा रहा है। हर कोई उनकी रणनीति की तारीफ कर रहा है। तीनों राज्यों में उन्होंने जिस अंदाज में सीएम पर फैसला सुनाया उसे भी काबिलेतारीफ माना जा रहा है। यकायक राहुल का कदम आसमान छूने लगा है। ऐसे में वह 2019 चुनाव के लिए स्वभाविक तौर पर पीएम उम्मीदवार बन गए हैं। कल तक जो भी सियासी दल और नेता राहुल को खारिज कर रहे थे, अब चुप्पी साधे हुए हैं। यही वजह है कि राहुल की पीएम उम्मीदवारी पर वैसी तल्खी दिखाई नहीं देती जिस तरह पहले नजर आती थी।
राहुल की बढ़ती ताकत के बावजूद इसके कई क्षेत्रीय दल और क्षत्रप राहुल को आसानी से स्वीकार करने को राजी नहीं होंगे। इसकी बानगी भी तब देखने को मिल गई जब राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की ताजपोशी में विपक्षी दलों के कई कद्दावर नेता पहुंचे लेकिन अखिलेश यादव और मायावती नदारद रहे। जबकि 6 महीने पहले कर्नाटक में कुमारस्वामी के राजतिलक में दोनों नेता खूब उत्साह के साथ पहुंचे थे। जिस शख्स को ये दोनों नेता अतीत में कई बार खारिज कर चुके हैं, उसका अचानक इतना ताकतवर हो जाना शायद इन्हें अखर रहा हो। तमाम सियासी घटनाक्रम 2019 में नरेंद्र मोदी के सामने राहुल के सबसे प्रमुख प्रतिद्वंदी के तौर पर उभरने का संकेत दिखा रहे हैं।