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चुनाव आयोग का SC में हलफनामा, अपराधियों के आजीवन चुनाव लड़ने पर लगे पाबंदी

Tue, 21 Mar 2017 08:47 AM IST
amarujala.com- presented by: रोहित कुमार पोरवाल
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भारतीय निर्वाचन आयोग
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चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि आपराधिक मामलों में दोषियों के चुनाव लडने पर आजीवन पाबंदी होनी चाहिए। साथ ही आयोग का यह भी मानना है कि आपराधिक मामलों में आरोपी नेताओं का ट्रायल एक वर्ष के भीतर पूरा हो जाना चाहिए। वर्तमान प्रावधान के मुताबिक, दोषी पर सजा काटने के छह वर्ष तक ही चुनाव लड़ने पर पाबंदी है।
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चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा है कि वह निष्पक्ष चुनाव के लिए प्रतिबद्ध है। आयोग ने कहा कि वह इसका समर्थन करती है कि आपराधिक मामलों में दो या उससे अधिक वर्ष की सजा पाने वालों पर चुनाव लड़ने की आजीवन पाबंदी होनी चाहिए। उसका कहना है कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए इस तरह की पाबंदी होनी चाहिए। भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपना यह पक्ष रखा है। 

हलफनामे में आयोग ने कहा कि चुनाव सुधार को लेकर उन्होंने विस्तृत प्रस्ताव सरकार को सौंप दिया है। इनमें अपराधमुक्त राजनीति, रिश्वत को संज्ञेय अपराध बनाना, पेड न्यूज पर पाबंदी और मतदान के 48 घंटे पहले तक विज्ञापनों पर प्रतिबंध आदि हैं। आयोग ने कहा कि अधिकतर सिफारिशों को विधि आयोग ने अपनी 244 और 255वीं रिपोर्ट को अप्रूव कर दिया है। फिलहाल यह केंद्र सरकार के विचाराधीन है।
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'चुनाव लड़ने के लिए अधिकतम उम्र और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता तय हो'

मालूम हो कि अश्विनी उपाध्याय ने अपनी याचिका में गुहार लगाई है कि आपराधिक मामलों में दो वर्ष या इससे अधिक की सजा पाने वालों पर आजीवन चुनाव लड़ने की पाबंदी लगा दी जानी चाहिए। साथ ही राजनेताओं के मामले का ट्रायल एक वर्ष के भीतर पूरा हो जाना चाहिए। साथ ही याचिका में यह भी गुहार की गई है कि चुनाव लड़ने के लिए अधिकतम उम्र निर्धारित हो और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता तय हो। 

चुनाव लड़ने के लिए अधिकतम उम्र और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता तय करने के मसले पर आयोग ने कहा कि यह विधायिका के कार्यक्षेत्र में है और इसके लिए संविधान में संशोधन की जरूरत है। 
याचिकाकर्ता का कहना है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका में ऐसी व्यवस्था है कि अगर कोई व्यक्ति आपराधिक मामले में दोषी ठहराया जाता है तो वह नौकरी से बर्खास्त हो जाता है वहीं विधायिका पर यह मापदंड लागू नहीं होता। याचिका में विधायिका में भी यही मापदंड तय करने की गुहार की गई है। 

याचिका में कहा गया कि  मौजूदा स्थिति है कि दोषी ठहराए जाने और सजा काटने के दौरान भी दोषी राजनीतिक दल बना सकता है और वह दल का पदाधिकारी बन सकता है। इतना ही सजा काटने के छह वर्ष बाद भी दोषी फिर से चुनाव लड़ सकता है।
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