पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत चुनाव आयोग की इस सतही लड़ाई से हतप्रभ हैं। उन्होंने कहा आयोग के लिहाज से यह दुखद है। रावत ने इस लड़ाई की टाइमिंग पर भी सवालिया निशान लगाया। उन्हों ने कहा ऐन चुनाव खत्म होने के एक दिन पहले इस तरह की बात आखिर माजरा क्या है। यह समझना होगा। मीडिया की भूमिका पर भी उन्होंने सवाल उठाया है। रावत ने कहा आयोग पर जनता का विश्वास है। इसलिए हर एक्शन न्याय और पारदशता का आइना होता है। उसमें एक खरोच संस्था की छवि पर बट्टा लगा सकती है।
रावत ने कहा जो भी हुआ वह स्वस्थ परंपराओं के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। लेकिन क्योंकि उन्होंने अशोक लवासा और सुनील अरोड़ा दोनों के साथ काम किया है। इसलिए वह मौजूदा हालात पर कुछ भी कहना नहीं चाहते। जिस मामले में विरोध था क्या उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए इस पर रावत का कहना है क्यों नहीं पहले भी कई बार एमसीसी के मामले को लेकर एक राय नहीं बनी।
ऐसा उनके टाइम में भी हुआ। इससे पहले 1993 से लेकर 1996 तक टीएन शेषन, जीवीजी कृष्णमूत, और एमएस गिल के समय में तीन बार ऐसा हुआ। फैसला बहुमत के आधार पर किया गया। इसके बाद 2008 -2009 में जब एम गोपालास्वामी, एस वाई कुरैशी, नवीन चावला थे चार से पांच मर्तबा फैसलों पर एक राय नहीं बनी सभी फैसले सार्वजनिक हुए जनता को उनके बारे में पता चला।
मेरे विचार से अब इस विषय पर बोलना ठीक नहीं है। क्योंकि चुनाव अब खत्म है। वैसे अगर विचार नहीं मिलते तो अपनी बात कहने का मौका सबको मिलता है। अब अचानक ऐसा क्या हुआ। जो इस तरह से विवाद खड़ा हो गया। जनता के बीच अच्छा संदेश नहीं गया। उन्होंने कहा ऐसा लग रहा है मीडिया कि बनाई हुई स्टोरी है।
रावत ने कहा ईसीआई प्रतिष्ठित संस्थान है। लोगों का इस पर बहुत भरोसा। इसलिए लोगों के विश्वास को बनाए रखना बहुत जरूरी है। कोई फैसला ऐसा होना चाहिए जिससे लोगों को लगे यही उचित है। उनकी शिकायतों का त्वरित गति से फैसला होना चाहिए। उन्हें न्याय प्रदान करना चाहिए। इसके लिए आयोग को समय का ख्याल रखना चाहिए। जहां तक सवाल मामलों की मेरिट का है और कार्रवाई का है तो उसमें टाइमिंग को लेकर कोताही हुई है।
आयोग की थोड़ी से देरी ने सुप्रीमकोर्ट को भी उसके खिलाफ बोलने का मौका दे दिया। आयोग को शक्तिशाली और प्रभावशालियों पर तुंरत कारर्वाई करनी चाहिए ताकि बाकि समाज को नजीर मिले। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ईसीआई को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। पीएम, किसी पार्टी के प्रमुख की शिकायत पर तो तुरंत फैसला होना चाहिए। अगर उसमें एक महीने की देरी होती है तो जनता में क्या संदेश जाएगा। इससे आम लोगों ने आयोग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाना शुरु कर दिया है। इससे आयोग की छवि पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।
पूर्व वरिष्ठ प्रधान सचिव चुनाव आयोग आर के श्रीवास्तव कहते हैं कि आयोग के वर्तमान हालात दुनिया में आयोग की छवि पर प्रतिकूल असर डालेंगे। जिस तरह से आयोग के बड़े अधिकारी आमने-सामने हैं। वह साबित करता है कि आयोग की शुचिता और गौरवशाली इतिहास की परवाह किसी को नहीं है।