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ईडी का खुलासा: साइबर ठगी का पैसा पहले कैश, फिर मनी चेंजर से विदेशी मुद्रा में तबदील; ₹27,850 करोड़ का लेनदेन

Tue, 25 Aug 2026 02:46 PM IST
शिवम गर्ग डिजिटल ब्यूरो अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

ईडी ने गोवा के डिजिटल अरेस्ट मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार कर साइबर ठगी के बड़े नेटवर्क का खुलासा किया है। जांच में सामने आया कि ठगी की रकम को पहले कैश और फिर मनी चेंजर के जरिए विदेशी मुद्रा में बदला जाता था। नेटवर्क से जुड़ी कंपनियों ने ₹27,850 करोड़ से अधिक के लेनदेन किए, जबकि इनके खातों से जुड़े 20 राज्यों में 330 शिकायतें और 163 एफआईआर दर्ज हैं।
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ईडी - फोटो : Amar Ujala Graphics
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विस्तार
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ईडी ने गोवा के 'डिजिटल अरेस्ट' मामले में दो लोगों को गिरफ्तार  किया है। आरोपियों से पूछताछ के दौरान एक बड़ा खुलासा हुआ है। जांच एजेंसी को ऐसे नेटवर्क का पता चला है जो साइबर-फ्रॉड के पैसे को पहले कैश में बदलता था और फिर मनी चेंजर के माध्यम से उसे विदेशी मुद्रा में तबदील किया जाता था। इस मामले में शामिल कंपनियों ने 27850 करोड़ रुपये के ट्रांजेक्शन किए हैं। इन कंपनियों के बैंक खातों से जुड़ी 330 शिकायतें और 163 एफआईआर दर्ज हैं। केस की जड़ें 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैली हुई हैं।

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झूठे तौर पर 'सीक्रेट सुपरविजन अकाउंट्स'
ईडी के के पणजी जोनल ऑफ़िस ने 23 अगस्त को प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए), 2002 की धारा 19 के तहत फहीम मोइन हुसैन सैयद और नईम मुईन सैयद को गिरफ़्तार किया है। स्पेशल कोर्ट (पीएमएलए) ने दोनों आरोपियों को पांच दिन की ईडी कस्टडी में भेज दिया है। यह केस नॉर्थ गोवा के साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। इसमें गोवा की एक महिला को 'डिजिटल अरेस्ट' फ़्रॉड का शिकार बनाया गया था। महिला को यकीन दिलाया गया कि उसकी जांच चल रही है। वीडियो कॉल पर उसे लगातार निगरानी में रखा गया है। इस तरह उसे 21.05.2025 से 02.06.2025 के बीच उन अकाउंट्स में ₹2,60,33,634/- ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया। इसे झूठे तौर पर 'सीक्रेट सुपरविजन अकाउंट्स' बताया गया था।

आरबीआई से 'फुल फ़्लेज्ड मनी चेंजर' का लाइसेंस
जांच से पता चला है कि धोखाधड़ी से हासिल किया गया पैसा सिर्फ़ उन लोगों तक ही सीमित नहीं रहा, जिन्होंने पीड़िता को ठगा था। यह पैसा एक ऐसे संगठित सिस्टम में चला गया जिसका मकसद ही यही था — साइबर-फ्रॉड से मिले पैसे (जो आम बैंकिंग क्रेडिट के तौर पर आते थे) को पहले कैश में और फिर विदेशी मुद्रा में बदलना। इसके लिए ऐसी कंपनियों का इस्तेमाल किया गया, जिनके पास रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया से 'फ़ुल फ़्लेज्ड मनी चेंजर' का लाइसेंस था। पीड़िता का पैसा कुछ ही घंटों में, निष्क्रिय और हाल ही में खुले बैंक खातों की पहली परत (लेयर) से गुज़रा। फिर उसे ट्रांसफ़र, कैश निकासी, सेल्फ़-चेक और पेमेंट गेटवे के ज़रिए चार सौ से ज़्यादा लाभार्थी खातों में बांट दिया गया। जांच का दायरा उस परत से आगे बढ़कर कमोडिटी, ट्रेडिंग, ट्रैवल और विदेशी मुद्रा के कारोबार से जुड़ी कंपनियों के एक आपस में जुड़े समूह तक पहुंचा।
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कैश संभालने का पैमाना और तरीका अलग था
इन कंपनियों ने मिलकर 27,850 करोड़ रुपये से ज़्यादा के बैंकिंग ट्रांज़ैक्शन किए। लगभग 2,904 करोड़ रुपये कैश में जमा किए गए। इसमें से 584.70 करोड़ रुपये कई जगहों पर लगीं 'बल्क नोट एक्सेप्टेंस मशीनों' के जरिए 61,448 अलग-अलग ट्रांज़ैक्शन में जमा किए गए। कैश संभालने का यह पैमाना और तरीका किसी भी आम कारोबार से बिल्कुल अलग था। जांच से यह भी पता चला है कि 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इन कंपनियों के बैंक खातों से जुड़ी 330 शिकायतें व 163 एफआईआर दर्ज हैं। कुल मिलाकर 417.49 करोड़ रुपये के नुकसान की बात कही गई है। इनमें से 101 शिकायतों में, एक ही धोखाधड़ी के दौरान एक पीड़िता का पैसा उसी समूह की दो या उससे ज़्यादा कंपनियों में भेजा गया। इससे यह साबित होता है कि ये खाते अलग-अलग कारोबार के तौर पर नहीं, बल्कि एक कॉमन पूल (साझा कोष) के तौर पर काम कर रहे थे।

कर्मचारी, ड्राइवरों को बनाया कंपनियों का मालिक
जांच में यह भी पता चला है कि जिन कंपनियों के ज़रिए पैसे का लेन-देन किया गया, वे बहुत कम आय वाले लोगों — जैसे कर्मचारी, ड्राइवर और एक कमरे के घरों में रहने वाले लोग — के नाम पर बनाई गई थीं। कागज़ों पर तो उन्हें डायरेक्टर दिखाया गया था, लेकिन उन कंपनियों के बैंक अकाउंट और कामकाज असल में दूसरों के कंट्रोल में थे। ईडी ने जुलाई में मुंबई और गोवा में 20 जगहों पर रेड कर 3.25 करोड़ रुपये नकद ज़ब्त किए हैं। 30 करोड़ रुपये से ज़्यादा बैलेंस वाले सिंडिकेट अकाउंट्स को फ़्रीज़ कर दिया गया है। इसके साथ ही डिजिटल डिवाइस, अकाउंट की किताबें, रिकॉर्ड और कानूनी रजिस्टर भी ज़ब्त किए गए हैं, जिनकी जांच की जा रही है।

एजेंसी किसी को 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करती
प्रवर्तन निदेशालय ने जनता को फिर से सावधान किया है कि देश में कोई भी जांच या कानून लागू करने वाली एजेंसी किसी व्यक्ति को 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करती है। वीडियो कॉल पर भी जांच नहीं करती है। व्यक्ति से 'वेरिफिकेशन' या 'सुपरविजन' के लिए किसी अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करने को नहीं कहती है। ऐसी कोई भी मांग धोखाधड़ी है। अगर नागरिकों को ऐसी कोई कॉल आती है, तो उन्हें कॉल काट देनी चाहिए और तुरंत नेशनल साइबरक्राइम हेल्पलाइन 1930 या www.cybercrime.gov.in पर इसकी रिपोर्ट करनी चाहिए।

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