न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश की पीठ के समक्ष मंत्री और उनकी पत्नी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने धन शोधन रोकथाम कानून (पीएमएलए), दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के विभिन्न प्रावधानों और शीर्ष अदालत के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ईडी के पास पुलिस एजेंसी न होने के नाते गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं है।
उन्होंने कहा, 'पीएमएलए के तहत ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि प्रवर्तन निदेशालय किसी आरोपी को अपनी हिरासत में उसी तरह से रिमांड पर ले सकता है जिस तरह से थाने का प्रभारी अधिकारी सीआरपीसी की धारा 167 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कर सकता है।' सिब्बल ने कहा, 'अगर ईडी का कोई अधिकारी पुलिस अफसर नहीं है, जब पीएमएलए के तहत निर्दिष्ट अपराध के आरोपी व्यक्ति को अनिवार्य रूप से सवालों के जवाब देने होते हैं या अभियोजन का सामना करना पड़ता है, जिससे उनका बयान मुकदमे में स्वीकार्य हो जाता है, तो वे किस स्तर पर पुलिस अधिकारी बन जाते हैं।'
उन्होंने विजय मदनलाल चौधरी मामले में शीर्ष अदालत के 2022 के फैसले का हवाला दिया और कहा कि इसमें कहा गया था कि ईडी अधिकारी 'पुलिस अधिकारी' नहीं हैं। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में धन शोधन रोकथाम कानून (पीएमएलए) के तहत गिरफ्तारी, धन शोधन में शामिल संपत्ति कुर्क करने, तलाशी और जब्ती से संबंधित ईडी की शक्तियों को बरकरार रखा था।
हालांकि, अदालत ने कहा था कि 2002 के अधिनियम के तहत अधिकारी 'इस तरह के पुलिस अधिकारी नहीं हैं' और प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत प्राथमिकी के बराबर नहीं माना जा सकता है। वरिष्ठ वकील ने कहा कि 2022 के फैसले में कई विसंगतियां हैं और इसे कई आधारों पर चुनौती दी गई है, लेकिन यह कहा गया है कि ईडी के अधिकारी पुलिस अधिकारी नहीं हैं और इसलिए, गिरफ्तारी और हिरासत में पूछताछ के संबंध में पुलिस के पास उपलब्ध शक्तियां धन शोधन रोधी एजेंसी के पास उपलब्ध नहीं हैं।
उन्होंने कहा, 'निजी तौर पर मुझे लगता है कि विजय मदनलाल का फैसला गलत है लेकिन इस पर फैसला दूसरी अदालत को करना है। लेकिन यहां मैं यह कहने के लिए उस फैसले पर भरोसा कर रहा हूं कि ईडी के अधिकारी पुलिस अफसर नहीं हैं। पीठ ने कहा, आपकी दलील यह है कि जब तक आप पुलिस अधिकारी नहीं हैं, तब तक रिमांड मांगने का सवाल ही नहीं उठता। सिब्बल ने कहा कि इस मामले में आपराधिक कानून की सामान्य धारणा लागू नहीं की जा सकती।