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मनी लॉन्ड्रिंग केस: न्यूजक्लिक के खिलाफ शीर्ष कोर्ट पहुंची ईडी; हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती, क्या है विवाद?

Sat, 24 Oct 2026 10:31 PM IST
निर्मल कांत पीटीआई, नई दिल्ली।

सार

न्यूजक्लिक के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला रद्द करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। एजेंसी का आरोप है कि हाईकोर्ट ने पीएमएलए मामले की जांच किए बिना ईसीआईआर रद्द कर दी। आखिर यह पूरा मामला क्या था, हाईकोर्ट ने क्या कहा था और ईडी का क्या कहना है? पढ़िए इस रिपोर्ट में। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक/एएनआई
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विस्तार
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प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने न्यूज पोर्टल न्यूजक्लिक और उसके प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ धनशोधन का मामला रद्द कर दिया था। यह मामला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के नियमों के उल्लंघन के आरोपों से जुड़ा है।
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ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। एजेंसी का कहना है कि हाईकोर्ट ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के मामले की जांच किए बिना ही ईसीआईआर (प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट) रद्द कर दी। ईडी ने फैसला सुनाने में पांच महीने की देरी पर भी सवाल उठाया है। फिलहाल, इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं किया गया है।

हाईकोर्ट ने 29 मई को यह फैसला दिया था। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने कहा था कि दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) की ओर से दर्ज प्राथमिकी को जारी रखना 'कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग' था। उन्होंने कहा था कि जब मूल अपराध से जुड़ी प्राथमिकी रद्द हो गई, तो ईडी की ईसीआईआर भी बंद होनी चाहिए।
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क्या था विदेशी निवेश से जुड़ा आरोप?
ईओडब्ल्यू ने वर्ष 2020 में प्राथमिकी दर्ज की थी। इसमें न्यूजक्लिक की मूल कंपनी पीपीके न्यूजक्लिक स्टूडियो प्राइवेट लिमिटेड पर आरोप लगाए गए थे।

प्राथमिकी के अनुसार, कंपनी को वित्त वर्ष 2018-19 में अमेरिका की वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी से 9.59 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मिला था। आरोप था कि यह निवेश विदेशी निवेश कानून का उल्लंघन करके किया गया। इससे सरकारी खजाने को नुकसान हुआ।

प्राथमिकी में शेयरों का मूल्य बढ़ाकर दिखाने का भी आरोप था। दावा किया गया कि ऐसा डिजिटल समाचार वेबसाइट में एफडीआई की 26 प्रतिशत की सीमा से बचने के लिए किया गया।

इसके अलावा, आरोप लगाया गया कि निवेश की 45 प्रतिशत से अधिक राशि दूसरी जगह भेज दी गई या निकाल ली गई। यह राशि वेतन, परामर्श शुल्क और किराये जैसे खर्चों के रूप में दिखाई गई थी।

इसके बाद ईडी ने न्यूजक्लिक, प्रबीर पुरकायस्थ और अन्य लोगों के खिलाफ धनशोधन का मामला दर्ज किया। पीपीके न्यूजक्लिक स्टूडियो ने प्राथमिकी रद्द करने की मांग की थी। कंपनी ने कहा था कि इसमें अस्पष्ट आरोप लगाए गए हैं।

हाईकोर्ट ने मामला क्यों रद्द किया?
हाईकोर्ट ने कहा था कि निवेश करना एक आर्थिक फैसला था। इससे अपने आप में किसी आपराधिक अपराध का पता नहीं चलता।अदालत ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के जवाब का भी जिक्र किया। मंत्रालय ने समाचार पोर्टल के पत्र के जवाब में बताया था कि संबंधित समय में डिजिटल मीडिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर कोई सीमा या प्रतिबंध नहीं था।

हाईकोर्ट ने माना कि निवेश स्वीकार्य तरीकों से किया गया था। कोर्ट ने कहा कि सभी आरोपों को सही मान लेने पर भी धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात का अपराध साबित नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी के मामले में किसी व्यक्ति का ठगा जाना जरूरी है। इस मामले में वह व्यक्ति वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी होनी चाहिए थी। लेकिन कंपनी ने ऐसी कोई शिकायत नहीं की थी। शिकायत केवल एक सूचना देने वाले व्यक्ति ने की थी।

कोर्ट ने खर्चों से जुड़े आरोपों पर भी टिप्पणी की। उसने कहा कि डिजिटल समाचार कारोबार चलाने वाली कंपनी को वेतन, परामर्श शुल्क और किराये जैसे खर्च करने पड़ते हैं। इसलिए इन खर्चों के जरिये धन की हेराफेरी किए जाने का आरोप टिकाऊ नहीं था।

आपराधिक साजिश के आरोप पर क्या कहा?
हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत आपराधिक साजिश के आधार पर धनशोधन का मामला जारी रखने की ईडी की कोशिश को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी को बताना होगा कि न्यूजक्लिक और अन्य लोगों ने अपराध करने के लिए कौन-सा 'गैरकानूनी उद्देश्य' अपनाया था। यह भी बताना होगा कि उन्होंने किन 'तरीकों' का इस्तेमाल किया।

कोर्ट ने कहा, 'खास बात यह है कि ईडी ने करीब डेढ़ साल तक व्यापक जांच की। याचिकाकर्ताओं और उनके कर्मचारियों को कई बार बुलाकर पूछताछ की गई। लेकिन आज तक कोई भी आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली और न ही अदालत के रिकॉर्ड पर रखी गई।'

कोर्ट ने आगे कहा, 'आपराधिक साजिश के केवल सामान्य आरोपों के अलावा कोई ऐसा आपत्तिजनक आरोप नहीं है, जो दूर-दूर तक भी पीएमएलए की धारा 4 के तहत दंडनीय अपराध किए जाने का संकेत देता हो'।

हाईकोर्ट ने प्राथमिकी संख्या 0116/2020 और ईसीआईआर संख्या ईसीआईआर/14/एचआईयू/2020 रद्द कर दी थीं। कोर्ट ने यह भी कहा था कि जब ईसीआईआर ही रद्द कर दी गई है, तो उसकी प्रति उपलब्ध कराने की मांग का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
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