प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), सूरत उप-क्षेत्रीय कार्यालय ने 29 जुलाई को धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (पीएमएलए) के प्रावधानों के तहत मेसर्स यूनिवर्सल जेम्स के मीत कछाड़िया से संबंधित 204.62 करोड़ रुपये मूल्य के प्राकृतिक और प्रयोगशाला में विकसित हीरों के रूप में अपराध की आय को अनंतिम रूप से कुर्क किया है। आरोपियों ने कटे और पॉलिश किए गए प्राकृतिक हीरों का निर्यात कर 204.62 करोड़ रुपये कमा लिए। इसका मकसद, देश के बाहर काला धन जमा करना था।
ईडी ने कस्टम अधिनियम, 1962 की धारा 132, 135 और 140 के तहत कस्टम अधिकारियों, सूरत द्वारा दर्ज की गई शिकायत के आधार पर पीएमएलए के तहत जांच शुरू की थी। वर्तमान मामले में, डीआरआई, सूरत को सूचना मिली थी कि मीत कनुभाई कछाड़िया की स्वामित्व वाली फर्म मेसर्स यूनिवर्सल जेम्स, सूरत एसईजेड, सचिन में एसईजेड संस्थाओं को प्रदान की गई सुविधाओं का दुरुपयोग करके दो निर्यात खेपों के माध्यम से प्रयोगशाला में विकसित हीरों की आड़ में कटे और पॉलिश किए गए प्राकृतिक हीरों का निर्यात करने का प्रयास कर रही थी।
सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 के प्रावधानों के तहत जांच के दौरान, दोनों निर्यात खेपों की गुणवत्ता, मात्रा और मूल्य के मामले में घोर गलत घोषणा पाई गई। माल को प्रयोगशाला में उगाए गए हीरे घोषित किया गया था, जिनकी कीमत 2.93 करोड़ रुपये थी, जबकि भौतिक जाँच के दौरान माल प्राकृतिक रूप से कटे और पॉलिश किए गए हीरे पाए गए, जिनकी कीमत 204.62 करोड़ रुपये थी। इसलिए, इन्हें सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 के प्रावधानों के तहत ज़ब्त कर लिया गया।
पीएमएलए के तहत जांच के दौरान, यह पाया गया कि मेसर्स यूनिवर्सल जेम्स के मालिक मीत कनुभाई कछाड़िया कोई वैध व्यवसाय नहीं कर रहे थे, बल्कि केवल प्राकृतिक हीरों के रूप में बेहिसाब धन/काले धन को एसईजेड संस्थाओं को प्रदान की गई सुविधाओं का दुरुपयोग करके निर्यात खेपों के माध्यम से प्रयोगशाला में उगाए गए हीरों के रूप में गलत तरीके से घोषित करके गबन करने में शामिल थे। इस गलत घोषणा का उद्देश्य भारत के बाहर भारी मात्रा में धन (काला धन/बेहिसाब नकदी) जमा करना था। केस में आगे की जांच जारी है।