प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), दीमापुर उप क्षेत्रीय कार्यालय ने एचपीजेड टोकन निवेश घोटाले की जांच में एक बड़ी कार्रवाई की है। ईडी ने 94 बैंक खातों को अस्थायी तौर पर अटैच कर दिया है। अभी तक 662 करोड़ रुपये जब्त कर लिए गए हैं। इस मामले में आरोपियों ने निवेशकों को धोखा देकर 2200 करोड़ रुपये की आपराधिक आय एकत्रित की है। ईडी ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के प्रावधानों के तहत जो बैंक खाते अटैच किए हैं, उनमें लगभग 10.24 करोड़ रुपये (अपराध से प्राप्त धनराशि) जमा किए गए हैं। ईडी ने बड़े पैमाने पर साइबर-आधारित वित्तीय धोखाधड़ी के मामले में यह कार्रवाई की है।
बता दें कि ईडी ने एचपीजेड टोकन और अन्य के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत नागालैंड के कोहिमा स्थित साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन द्वारा दिनांक 08.10.2021 को दर्ज एफआईआर संख्या 03/2021 के आधार पर उक्त मामले की जांच शुरू की है। इसके बाद, गुवाहाटी के उलुबारी स्थित सीआईडी पुलिस स्टेशन द्वारा दिनांक 02.09.2021 को दर्ज की गई एफआईआर संख्या 0006/2021 और दिल्ली स्थित सीबीआई, ईओ-III द्वारा दिनांक 08.06.2022 को दर्ज की गई आरसी 2212022ई0022 सहित संबंधित एफआईआर की भी पीएमएलए जांच के तहत लाया गया है।
ईडी की जांच से पता चला है कि एचपीजेड टोकन घोटाला एक बड़े पैमाने पर किया गया निवेश घोटाला है। इसमें देशभर के भोले-भाले निवेशकों को उच्च प्रतिफल के झूठे वादों के झांसे में एचपीजेड टोकन ऐप के माध्यम से निवेश करने के लिए प्रेरित किया गया था। बड़ी संख्या में फर्जी खातों, शेल कंपनियों, फर्जी निदेशकों और भुगतान एग्रीगेटर सेवाओं के दुरुपयोग का इस्तेमाल अपराध की आय को छिपाने और उसे वैध बनाने के लिए किया गया था। वित्तीय लेन-देन की पड़ताल के बाद निवेशक भूपेश अरोरा और उसके सहयोगियों सहित मुख्य आरोपियों तक धन के हस्तांतरण का पता चला है। धन की शुरुआती वसूली एक निजी बैंक में रखे गए फर्जी खातों से जुड़े कई यूपीआई आईडी के माध्यम से की गई थी।
जांच एजेंसी के मुताबिक, इसके बाद, अपराध की आय को विभिन्न शेल कंपनियों में स्थानांतरित कर दिया गया। वहां पर PayU, Aggrepay और Easebuzz जैसे भुगतान एग्रीगेटर प्लेटफॉर्मों का गलत इस्तेमाल करके और उनका दुरुपयोग करके धन प्राप्त किया गया। धन का एक छोटा हिस्सा निवेशकों को वापस भेज दिया गया, ताकि वैधता का झूठा आभास कराया जा सके। उन्हें और ज्यादा निवेश करने के लिए प्रेरित किया जा सके। जांच के दौरान फर्जी खातों और फर्जी कंपनियों का एक जटिल नेटवर्क सामने आया है, जिसमें भूपेश अरोरा, उनके पिता गुलशन अरोरा और अन्य सहयोगी निदेशक हैं। इस नेटवर्क का हिस्सा मानी जाने वाली कुछ कंपनियों में अलग अलग लोग मिले हैं, लेकिन उनका नियंत्रण एक ही परिवार के हाथ में रहा है। मेसर्स डिजी इंडिया मार्केटिंग (जिसके एकमात्र मालिक इंदु प्रभा शर्मा हैं, लेकिन मालिक के अनुसार भूपेश अरोरा द्वारा नियंत्रित), मेसर्स एनालिटिक बिजनेस वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड (निदेशक अक्षय धवन और विवेक कुमार, दोनों भूपेश अरोरा के कर्मचारी हैं)।
मेसर्स फ्रीबी सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड (निदेशक भूपेश अरोरा और गुलशन अरोरा), मेसर्स ट्रूविंटा सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड (निदेशक अवेग शर्मा, लेकिन अवेग शर्मा के अनुसार भूपेश अरोरा द्वारा नियंत्रित), मेसर्स जैवियन ट्रेडिंग प्राइवेट लिमिटेड (निदेशक प्रिंस कुमार और दीपक कुमार, लेकिन भूपेश अरोरा द्वारा नियंत्रित) और मेसर्स सार्क एनरोल सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड (निदेशक ठाकुर दयापाल सिंह, लेकिन ठाकुर दयापाल सिंह के अनुसार भूपेश अरोरा द्वारा नियंत्रित)। आरोप है कि भूपेश अरोरा ने अपने कई सहयोगियों के साथ मिलकर इन संस्थाओं और अन्य फर्जी खातों, हवाला संचालकों और विदेशी मुद्रा चैनलों के नेटवर्क का इस्तेमाल करके अपराध से प्राप्त इतनी बड़ी धनराशि को मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए वैध बनाया है।