काशी विश्वनाथ, अयोध्या और अब प्रयागराज-इन तीनों में एक बड़ी समानता है कि वहां दूर-दूर से आने वाले तीर्थयात्रियों का तांता लगा हुआ है। एक आस्था है, जो उन्हें सनातनियों के पवित्र स्थानों पर लिए जा रही है। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में जब श्रद्धालु यात्रा करते हैं, तो वे खर्च भी बहुत करते हैं। ट्रांसपोर्ट और खाने-पीने पर तो वे पैसे खर्च करते ही हैं, उन धार्मिक स्थलों की चुनिंदा यादगार चीजें या अपने इष्ट मित्रों को देने के लिए उपहार वगैरह भी खरीदते हैं।
भारत में ऐसे कई प्राचीन धार्मिक स्थल हैं, जो साल के कुछ महीने पर्यटकों या भक्तों से भरे रहते हैं। प्रयागराज में दावा किया गया कि महाशिवरात्रि से पहले 60 करोड़ से भी ज्यादा लोग संगम में स्नान कर चुके हैं। बेशक इस आंकड़े में थोड़ा बहुत ऊपर-नीचे हो सकता है, लेकिन यह संख्या इतनी बड़ी है कि इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता है। दुनिया के इतिहास में इतना बड़ा धार्मिक समागम कभी नहीं हुआ है। प्रयागराज के साथ ही अयोध्या में भी लाखों लोग पहुंचकर रामलला के दर्शन कर रहे हैं। ऐसा ही कुछ वाराणसी में भी हो रहा है, जहां लाखों लोग हर दिन बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर रहे हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाली सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत का धार्मिक पर्यटन बाजार तेजी से बढ़ रहा है और 2024 में इसका आकार 118 करोड़ 80 लाख डॉलर था। एजेंसी ने अनुमान लगाया है कि 2027 तक आते-आते यह राशि 15.1 फीसदी की दर से बढ़कर सालाना 315 करोड़ 90 लाख डॉलर यानी लगभग 270 अरब रुपये हो जाएगी। यह राशि ज्यादा भी हो सकती है।
सीएमआईई ने इसके कई कारण बताए हैं। सबसे बड़ा कारण यह है कि इन धार्मिक स्थलों में तथा उनके इर्द-गिर्द बुनियादी ढांचों का बढ़िया विकास हुआ है। सरकार ने काफी सुविधाएं दी हैं, जैसे सड़कें, पार्किंग, होटलों और गेस्ट हाउसों को जमीन, दुकानों का आवंटन, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा वगैरह। पहले की तरह अब वहां अव्यवस्था और लूट नहीं है। ऑनलाइन व्यवस्था हो जाने से बाहरी तीर्थयात्रियों को आरक्षण लेने में आसानी होती है। स्थानीय निवासियों द्वारा भी धार्मिक पर्यटन से जुड़े कारोबार में दिलचस्पी लेने से अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है।
अयोध्या और वाराणसी में अब फाइव स्टार होटल खुल रहे हैं, जो यह दर्शाता है कि देश का समृद्ध वर्ग भी धार्मिक पर्यटन में दिलचस्पी ले रहा है। यह वह वर्ग है, जो काफी खर्च करता है और जिसका असर वहां के उद्योगों, खासकर कुटीर उद्योगों पर पड़ता है। लोगों की खपत का अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है और ज्यादा खपत होने से जीडीपी भी बढ़ती है। धार्मिक स्थलों में लोग जब बड़े पैमाने पर खरीदारी करते हैं, तो उससे न केवल स्थानीय कारोबार बढ़ता है, बल्कि रोजगार के साधन भी बढ़ते हैं। धार्मिक पर्यटन बढ़ने से बनारसी साड़ियों के व्यापार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है और खाने-पीने की वस्तुओं की दुकानों में भी भारी वृद्धि हुई है, जिससे स्थानीय लोगों की माली हालत तो सुधरी ही है, उनके पास कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ी है यानी रोजगार भी बढ़ा है। यह रोजगार भले ही मौसमी हो, लेकिन इसने कमाई का एक बड़ा जरिया बना दिया है।
देश की अर्थव्यवस्था पर धार्मिक पर्यटन के प्रभाव को देखते हुए भारत सरकार ने कई कल्याणकारी योजनाएं बनाई हैं। इनमें एक स्कीम है-प्रसाद यानी तीर्थस्थल सुधार और धरोहर विकास ड्राइव। स्वदेश दर्शन स्कीम 2.0 के लिए सरकार ने 28 राज्यों तथा दो केंद्रशासित प्रदेशों के लिए 6,121.69 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया। इसके तहत 15 थीम आधारित सर्किट, जैसे बौद्ध, हिमालय, कृष्णा, रामायण, आध्यात्मिक, सूफी और तीर्थंकर का विकास किया जा रहा है, ताकि सभी धर्मों के लोगों को सुविधा मिले। इसके तहत अमरावती, द्वारका, सोमनाथ, गया, वाराणसी, गंगोत्री-यमुनोत्री, अजमेर शरीफ वगैरह को विकसित किया गया और अब भी केंद्र सरकार इन पर खर्च कर रही है। इसी वजह से 2021 से लेकर 2022 के एक वर्ष की अवधि में पर्यटन से प्राप्त कुल राजस्व दोगुना हो गया।
दरअसल, निजी-सार्वजनिक भागीदारी का फॉर्मूला यहां भी लागू हो रहा है। स्थानीय समुदायों को साथ लेकर विकास करना बेहतर परिणाम देता है। इससे स्थानीय स्तर पर राजस्व में बढ़ोतरी होती है। देश में डिजिटल क्रांति होने से हमारे तीर्थ स्थलों के बारे में, उनके कामकाज के बारे में पारदर्शिता आई है, जिससे श्रद्धालुओं में एक विश्वास बना रहता है। धार्मिक पर्यटन ने देश को एक सूत्र में मजबूती से पिरोने का काम किया है। सभी जानते हैं कि हमारे तीर्थ स्थलों की राष्ट्र निर्माण में बड़ी भूमिका रही है और अब वे राजस्व सृजन में भी तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं।