भारत में, मित्रा इसी तरह के भूकंपीय आंकड़ों और अध्ययनों को देख रहे हैं। मित्रा ने पीटीआई को बताया कि हम लॉकडाउन के दौरान के आंकड़ों को जुटाना चाहते थे और यह देखना चाहते हैं कि भूकंपीय शोर किस स्तर तक कम हुआ है।
उन्होंने कहा कि मानवजनित गतिविधियों के कारण सांस्कृतिक व परिवेशीय शोर एक हर्ट्ज या उससे ऊपर है- और एक हर्ट्ज वह मानक आवृत्ति है जिस पर भूकंप की ऊर्जा आती है। मित्रा ने कहा कि इसलिए अगर शोर ज्यादा है, तो आम तौर पर भूकंपों का पता कम चलता है।
बंद के फलस्वरूप क्या हुआ, वह बताते हैं कि गाड़ियों की आवाजाही और मानव गतिविधियां कम हुईं जिसकी वजह से परिवेशीय शोर कम हुआ। उन्होंने कहा कि भूकंप का पता लगाने की सीमा कम हो गई है। इसलिए हल्के भूकंपों का भी ज्यादा पता चल रहा है।
भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु की भूकंप वैज्ञानिक कुशला राजेंद्रन ने कहा कि मानव गतिविधियों का स्तर कम होने से, भूकंप संवेदक अब हल्के भूकंपों का पता लगा सकते हैं जो पहले अन्यथा शोर का हिस्सा होते थे। उन्होंने बताया कि भूकंप केंद्र यातायात, सामुद्रिक लहरों या अन्य तरह के शोर से दूर स्थापित किए जाते हैं।
राजेंद्रन ने कहा कि स्थानिक कवरेज और पहुंच के लिहाज से कई केंद्रों को मानव गतिविधि की सीमा में ही बनाया जाता है। यह केंद्र इतने संवेदनशील होते हैं कि यह 500 मीटर के दायरे में किसी इंसान की पदचाप भी दर्ज कर सकते हैं। वह बताती हैं कि अगर शोर का स्तर बेहद कम रखा जाए तो ये संवेदक सबकुछ दर्ज करेंगे…।
भारत के प्रमुख भूकंप वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि यह कहना गलत होगा कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में कोविड-19 के कारण लागू किए गए बंद की वजह से धरती की सतह धीरे घूम रही हैं या उसके कम कंपन हो रहा है।
मित्रा कहते हैं कि इसका मतलब होगा कि टेक्टोनिक प्लेट धीमी हो गई हैं, जबकि ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा कि सतह की गति कम हुई है यह कहना तथ्यों को गलत तरीके से पेश करना होगा। धरती की सतह की गति धीमे नहीं हुई है। राजेंद्रन भी मित्रा की बात से सहमति जताते हुए कहती हैं कि सिर्फ बंद की वजह से सिर्फ मानवजनित शोर कम हुआ है।