नवरात्र और दशहरा के बाद अब दीपावली सबसे बड़ा त्यौहार है। इस मौसम में न चाहते हुए भी हम ज्यादा मिठाई और तैलीय चीजें खा जाते हैं, जो वजन बढ़ने का कारण बनते हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या इन खाद्य पदार्थों को बनाने में इस्तेमाल होने वाले तेलों में पाए जाने वाले ट्रांस फैट से होती है, जो रक्त नलिकाओं में वसा जमने के कारण बनते हैं। इसकी वजह से लोगों में हार्ट अटैक और स्ट्रोक की जानलेवा समस्या होती है।
एफएसएसएआई (FSSAI) के माध्यम से केंद्र सरकार देश में ट्रांस फैट का इस्तेमाल घटाने पर लगातार काम कर रही है। लक्ष्य निर्धारित किया गया है कि वर्ष 2022 तक औद्योगिक उत्पादों में ट्रांस फैट के इस्तेमाल का स्तर दो फीसदी से कम किया जाए। इसके लिए अनेक कार्यक्रम चलाकर लोगों को जागरुक भी किया जा रहा है। देश में केरल अकेला ऐसा राज्य है जिसने अपने स्तर पर ट्रांसफैट का उपयोग सबसे कम करने का लक्ष्य तय किया है।
वहीं घरेलू स्तर पर लोगों को जागरुक करके ट्रांस फैट के खतरों के प्रति जागरुक किया जा रहा है। महिलाओं की जागरुकता इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सबसे ज्यादा सहायक हो सकती है, इसलिए महिला केंद्रित मुहिम चलाने का लक्ष्य भी रखा गया है।
वनस्पति तेलों में उच्च तापमान पर हाइड्रोजन गैस प्रवाहित करने के बाद तेलों में रासायनिक परिवर्तन होता है। इस विधि के कारण तेलों में ज्यादा ठोस गुण पैदा होता है, जो इसके रखरखाव को आसान बनाता है। दावा किया जाता है कि इन ट्रांसफैट से बने खाद्य पदार्थ अपेक्षाकृत ज्यादा समय तक सुरक्षित रखे जा सकते हैं। लेकिन इसी प्रक्रिया में तेलों में ट्रांसफैट के गुण भी उत्पन्न होते हैं, जो शरीर को ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं।
मेट्रो अस्पताल के कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर पुनीत गुप्ता ने कहा कि ट्रांसफैट स्वयं ही स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक होते हैं, लेकिन जब किचन में एक ही तेल को बार-बार गर्म करके इस्तेमाल किया जाता है, तो इसमें रासायनिक परिवर्तन होते हैं, जो तेल को ज्यादा नुकसानदेह बनाते हैं। बाजार के समोसे इत्यादि खाना इसी वजह से ज्यादा नुकसानदेह होता है क्योंकि बाजार में एक ही तेल में बार-बार गर्म करके उन्हें बनाया जाता है।