भारत में दुग्ध अर्थव्यवस्था पर मंडराता संकट
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। 2023 में 23.9 करोड़ टन दूध उत्पादन हुआ था। देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा डेयरी पर निर्भर करता है। लगभग 70% ग्रामीण परिवार दूध उत्पादन और पशुपालन से जुड़े हैं। ऐसे में गर्मी से यदि दूध उत्पादन प्रभावित होता है, तो इससे पोषण सुरक्षा, दूध की कीमतों और ग्रामीण रोजगार पर बड़ा असर पड़ सकता है।
भारत में प्रति व्यक्ति दूध की खपत करीब 427 किलोग्राम प्रति वर्ष है जो वैश्विक औसत से लगभग चार गुना अधिक है। देश की अर्थव्यवस्था में डेयरी क्षेत्र का योगदान 4.5% है और यह ग्रामीण आजीविका की रीढ़ बना हुआ है, क्योंकि लगभग 8 करोड़ ग्रामीण परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़े हुए हैं। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के अनुमानों के अनुसार तापमान में प्रत्येक 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से दूध उत्पादन में 3 से 4 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है जो भारत जैसे गर्म जलवायु वाले देश के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकती है।
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दुनिया भर में पड़ेगा असर
दुनिया भर में लगभग 15 करोड़ परिवार दूध उत्पादन से अपनी जीविका चलाते हैं। लेकिन सबसे अधिक निर्भरता भारत और दक्षिण एशिया में है। यदि यहां दूध उत्पादन में गिरावट आती है तो इसका प्रभाव वैश्विक दूध आपूर्ति, खाद्य मूल्य और आयात-निर्यात संतुलन पर भी पड़ेगा। इसलिए बढ़ते तापमान के कारण गिरते दूध उत्पादन का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।
नीतिगत सुधार और व्यवहारिक बदलाव की जरूरत
शोधकर्ताओं ने नीति-निर्माताओं को सुझाव दिया है कि तकनीकी उपायों के साथ-साथ पशु कल्याण आधारित व्यवहारिक सुधार भी जरूरी हैं। जैसे गायों को अधिक खुला वातावरण देना, बछड़ों से अनावश्यक अलगाव से बचना और जल स्रोतों की सहज उपलब्धता देना ये उपाय गायों के तनाव को कम कर सकते हैं और उन्हें गर्मी के प्रति अधिक सहनशील बना सकते हैं। जल स्रोतों की सहज उपलब्धता देने से तात्पर्य यह है कि पशुओं को उनके आसपास ही पर्याप्त, साफ और ठंडा पानी बिना किसी रुकावट और कठिनाई के नियमित रूप से उपलब्ध कराया जाए। डेयरी फार्म या गोशालाओं में पानी तक पहुंचने के लिए गायों को अधिक दूरी न तय करनी पड़े।लगातार पानी पीने से गायों का शरीर गर्मी से लड़ने में सक्षम होता है और हीट स्ट्रेस कम होता है, जिससे उनका दूध उत्पादन बना रहता है।
दूध अब केवल पोषण नहीं जलवायु रणनीति की प्राथमिकता
शोध के निष्कर्ष में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन की मार अब रसोई तक पहुंच चुकी है। भारत जैसे देश जहां दूध केवल पोषण नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है, वहां इस खतरे को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। सरकारों को चाहिए कि वे दूध उत्पादन को जलवायु नीति का हिस्सा बनाएं और समय रहते ठोस रणनीति बनाएं नहीं तो आने वाले वर्षों में दूध की हर बूंद पर तपती गर्मी का बोझ होगा।