अगर आप ड्राइविंग कर रहे हैं तो सिर्फ गाड़ी चलाने पर ध्यान दें। यह चिंता अपने दिमाग से निकाल दें कि आगे कहीं पर सड़क खराब होगी या फिर कहीं फिसलन मिलेगी। बिलकुल ऐसा नहीं होगा। देश में अब सुरक्षित सडकें बनाने का फार्मूला तैयार कर लिया गया है। अब चाहे सड़क पर पानी ही क्यों न भरा हो, मगर वाहन फिसलेगा नहीं।
खास बात है कि नई तकनीक (बटूमेन इमलसन माइक्रो सरफेसिंग) की यह सड़क परपंरागत तरीके से बनाई जाने वाली सड़कों के मुकाबले कहीं ज्यादा चलेगी और आर्थिक तौर से भी बेहद किफायती साबित हुई है। वजह, पुरानी सड़कों की करीब सत्तर फीसदी सामग्री नई सड़क में इस्तेमाल होती है। खास बात है कि ये सड़क पूरी तरह से प्रदूषण फ्री हैं। सड़क बनाने की नई इस तकनीक को सेंटर रोड रिसर्च इन्स्टिटूट (सीआरआरआई) और इंडियन रोड कांग्रेस (आईआरसी) के वैज्ञानिकों ने खोजा है।
बता दें कि सड़क बनाने की पुरानी तकनीक में इस वक्त सबसे बड़ी बाधा कंकरीट का प्रचूर मात्रा में उपलब्घ नहीं होना है। दूसरा, इस सड़क को बनाने के लिए अधिकांश सभी तरह की नई सामग्री ही इस्तेमाल करनी पडती है। जब इस सड़क को बनाया जाता है तो वायु प्रदूषण होता है। परपरांगत तकनीक में समय भी ज्यादा लगता है। सीआरआरआई के पूर्व मुख्य वैज्ञानिक एवं सलाहकार और मौजूदा समय में इंडियन अकेडमी ऑफ हाईवे इंजीनियर्स में सीनियर फैकल्टी डॉक्टर पीके जैन का कहना है कि मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाइवे ने इस नई तकनीक के सम्बंध में सभी राज्यों को यह एडवायजरी जारी की है कि वे अब नए तरीके से सड़कों का निर्माण करें।
सबसे पहले उत्तर प्रदेश ने इस तकनीकी को अपनाया है। यूपी ने सरकार ने अपने सभी बड़े हाईवे प्राजेक्ट को इसी तरह बनाने का निर्देश जारी किया है। इसके बाद दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और मध्यप्रदेश सहित दूसरे कई राज्य भी अब इस तकनीक को अपनाने लगे हें। यूपी में बागपत से चंद्रावल तक की एमडीआर सड़क को नए फार्मूले से ही बनाया जा रहा है। खर्च की बात करें तो माइक्रो सरफेसिंग का खर्च डेढ़ सौ रुपये प्रति वर्गमीटर और पुरानी तकनीक यानी हॉट मिक्स में यह खर्च चार सौ रूपये तक पहुँच जाता है। इंडियन रोड कांग्रेस (आईआरसी) ने इस बाबत दो नए कोड तैयार किए हैं।
आईआरसी-37 2012 और आईआरसी-120-2015 जारी कर दिए हैं। अब जानियें सड़कों की मजबूती, सुरक्षित और किफ़ायती होने का राज.......
-पुरानी सड़क को 150 एमएम तक उखाड़ कर वह सामग्री वहीं पर छोड़ दी जाती है
-इस प्रक्रिया को फुल डेप्थ रेक्लमेशन ऑफ रोड कहते हैं
-इसे कोल्ड इंस्टियू रीसाइक्लिंग भी कहा जाता है, इसमें 40 एमएम की मोटाई वाली ताजा परत डाली जाती है
-नई तकनीक में करीब 80 प्रतिशत पत्थर और 30 फीसदी तारकोल बच जाता है
-पुरानी तकनीक में जहाँ दस किलोमीटर लम्बी सड़क बनाने में छह माह लगते हैं, वहीं नए तरीक़े में केवल एक माह लगता है।
-करीब सत्तर प्रतिशत समय भी बच जाता है
-कंकरीट की सड़क पर टायर फटने, स्लिप होने और आवाज आने जैसी कई समस्याओं से नई तकनीक में छुटकारा मिल जाता है।
- अगर नई तकनीक को कंकरीट वाले रोड पर इस्तेमाल कर रहे हैं तो उस पर दस एमएम की दो परत और यदि बिटूमस वाली रोड है तो वहां पांच एमएम की एक ही परत काफी है।
-खास बात है कि नई तकनीक में सड़क का स्किड रजिसटेंस हाई होता है, जिससे किसी भी मौसम में गाड़ी फिसलती नहीं है
इतनी जान चली जाती हैं सड़क हादसों में, 2016 की रिपोर्ट
-2016 में 121126 लोग सड़क हादसों में मारे गए
-रोड इंजीनियरिंग की खामी और गलत डिजाइन के कारण 1289 हादसे हुए, जिनमें 589 लोगों की जान चली गई
-खराब सड़क की वजह से 7158 हादसे हुए थे, इनमें 2983 जान चली गई थी
-सड़क पर बने गड्ढों के कारण देश में रोजाना छह लोग मारे जाते हैं, यह आंकड़ा अमेरिका में प्रतिवर्ष होने वाले कुल सड़क हादसों से ज्यादा है