एआईपी या मरीन प्रोपल्शन तकनीक गैर-परमाणु पनडुब्बियों को वायुमंडलीय ऑक्सीजन तक पहुंच के बिना संचालित करने की अनुमति देती है और पनडुब्बियों के डीजल-इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम को बढ़ाती है। इसका मतलब है कि एआईपी फिटेड पनडुब्बी को अपनी बैटरी चार्ज करने के लिए सतह पर नहीं आना पड़ता है और यह लंबे समय तक पानी के नीचे रहता है। एक ओर जहां न्यूक्लियर सबमरीन जहां शिप रिएक्टर की वजह से शोर मचाती हैं, वहीं एआईपी तकनीक से लैस पनडुब्बी एक घातक चुप्पी बनाए रखती है। यह नई तकनीक भारतीय सबमरीन को और भी ज्यादा घातक बनाएंगी।
पाकिस्तान ने फ्रांस से मांगी थी यह तकनीक
डीआरडीओ की इस तकनीक को फ्रांस से मदद मिली है, जो कलवरी क्लास मैन्युफैक्चरिंग के संदर्भ में भारतीयों के संपर्क में थे। हालांकि, इसके लिए पाकिस्तान ने भी फ्रांस की तरफ रुख किया था, लेकिन तत्काल अनुरोधों के बावजूद फ्रांस ने पाकिस्तानी एजोस्टा 90 बी पनडुब्बियों को एआईपी तकनीक के साथ अपग्रेड नहीं करने का फैसला किया, जिसके बाद इस्लामाबाद को चीन या तुर्की की ओर जाने को मजबूर होना पड़ा।