चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद के बीच भारत ने अपनी सैन्य प्रणाली को ताकतवर बनाने के लिए कई तरह के रक्षा उपकरण खरीदने की योजना बनाई है। इसमें लड़ाकू जेट विमानों से लेकर सुपरसोनिक हवाई जहाज को निशाना बनाने वाली मिसाइलें भी शामिल हैं।
खास बात ये है कि सैन्य साजो-सामान के अनेक उपकरण अपने देश में ही तैयार किए जाएंगे। इसके लिए कोई बड़े उद्योग धंधे लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि केंद्र सरकार यह अहम जिम्मेदारी अपने सूक्ष्म-लघु-मझोले उद्यमों यानी 'एमएसएमई' को देन जा रही है।
कई उपकरण तो ऐसे होंगे, जिनका 80 फीसदी उत्पादन भारत का एमएसएमई सेक्टर करेगा। इस योजना पर रक्षा मंत्रालय, डीआरडीओ और उद्योग मंत्रालय काम शुरू करेगा। शुरुआत में तीन सौ से अधिक सूक्ष्म-लघु-मझोले उद्यम इस योजना का हिस्सा बनेंगे। बाद में इनकी संख्या बढ़ती जाएगी।
बता दें कि केंद्र सरकार रक्षा क्षेत्र में 'मेक इन इंडिया' का दायरा बढ़ाने के लिए गंभीरता से काम कर रही है। इसके लिए एमएसएमई को भरपूर मौका दिया जाएगा। सरकार ने 33 लड़ाकू जेट विमान और मिसाइल खरीदने की योजना बनाई है।
गुरुवार को रक्षा मंत्रालय की डिफेंस एक्विजिशन कमेटी ने 38,900 करोड़ रुपये के इस सौदे को मंजूरी दे दी है। इस सौदे में दो तरह की भी मिसाइल शामिल हैं। पहली, जो 300 किलोमीटर दूर जमीन पर मार करेंगी।
दूसरी, हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल हैं। इनकी खूबी को बियोंड विज़ुअल रेंज भी कहा जाता है। इस मिसाइल की दूसरी खासियत यह है कि इसे किसी भी तरह के मौसम में छोड़ा जा सकता है।
अगर बरसात है तो भी ये मिसाइल अपने टारगेट पर पहुंच जाती है। जिस तरह यह मिसाइल दिन में अपने टारगेट पर पहुंचती है, उतनी ही तेजी से रात को मार करती है। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस मिसाइल के जरिए सुपरसोनिक एयरक्रॉफ्ट को आसानी से निशाना बना सकते हैं।
डिफेंस एक्विजिशन कमेटी ने पिनाक मिसाइल खरीदने को भी मंजूरी दी है। यह मिसाइल जमीन से जमीन पर एक हजार किलोमीटर तक मार करने की क्षमता रखती है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स में 12 एसयू-30 एमकेआई एयरक्रॉफ्ट का निर्माण होगा। इस पर 10,730 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
रक्षा मंत्रालय व उद्योग मंत्रालय ने डीआरडीओ के साथ मिलकर जो योजना बनाई है, उसके तहत उक्त रक्षा सामग्री के अनेक उपकरण एमएसएमई बनाएंगे। जब ये उपकरण खरीदे जाएंगे, तभी संबंधित कंपनी के साथ तकनीक के आदान प्रदान को लेकर करार होगा।
उद्योग मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि इसके लिए एमएसएमई कर्मियों को विशेष ट्रेनिंग दी जाएगी। यह जिम्मेदारी डीआरडीओ को सौंपी गई है। सरकार का प्रयास है कि रक्षा क्षेत्र में जो भी साजो-सामान, चाहे वह स्वदेश में बने या कहीं दूसरे मुल्क से आयात किया जाए, बाद में उसके उपकरण स्थानीय स्तर पर ही तैयार हों।
यही वजह है कि अब सरकार ने एमएसएमई सेक्टर को विशेष तव्वजो देनी शुरू की है।