ये निर्देश थे
2018 में लोक लेखा समिति ने आयकर विभाग को डाटा साझा करने की व्यवस्था बनाने को कहा था। इससे गृह मंत्रालय को भी विदेशी चंदे व संस्थाओं, इसे कहां दिया गया, किस काम आया, जैसी सूचनाओं की जानकारी रहती।
हुआ कुछ ऐसा
डाटा साझाा करने की व्यवस्था नहीं बनी। आयकर विभाग ने कई एनजीओ, ट्रस्टों आदि को छूट दी। 2014-15 से 2017-18 के तीन वर्षों में विभाग को दिए आईटीआर 7 फॉर्म में संस्थाओं ने अधूरी जानकारियां दी, कई कमियां छोड़ीं।
रिपोर्ट 2 : टाटा कम्युनिकेशन ने छिपाया राजस्व, कहा-वसूली हो
टाटा कम्युनिकेशन द्वारा 2006-07 से 2017-18 के बीच अपने राजस्व को कम बताने का मामला सामने आया है। इस कारण लाइसेंस शुल्क में 645 करोड़ रुपये की कमी आई। कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा, टाटा कम्युनिकेशन से यह रकम वसूल की जानी चाहिए। कंपनी का राजस्व 13,252.81 करोड़ रुपये रहा। इस पर 950 करोड़ रुपये का लाइसेंस शुल्क बनता है, जबकि कंपनी ने दूरसंचार विभाग को 305 करोड़ रुपये का लाइसेंस शुल्क दिया है। कैग ने कहा, स्पेक्ट्रम शुल्क के लिए एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (एजीआर) के 0.15% की न्यूनतम दर को ध्यान में रखते हुए अनुमानित राजस्व का आकलन बहुत ही कम स्तर पर किया गया।
रिपोर्ट 3 : सरकारी साधारण बीमा कंपनियों को 26,364 करोड़ रुपये का घाटा
चार सरकारी साधारण बीमा कंपनियों को पिछले पांच साल में उनके स्वास्थ्य सेगमेंट से 26,364 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। कैग की रिपोर्ट के अनुसार, न्यू इंडिया अश्योरेंस, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस, ओरिएंटल इंश्योरेंस और नेशनल इंश्योरेंस को 2016-17 से 2020-21 के दौरान यह घाटा हुआ है। कैग ने कहा, ग्रुप पॉलिसी में कंपनियों को ज्यादा दावे मिले, जिससे ऐसा हुआ। सरकारी कंपनियों के लिए मोटर बीमा के बाद स्वास्थ्य बीमा सबसे ज्यादा कारोबार वाला क्षेत्र है।
1.16 लाख करोड़ का मिला प्रीमियम
चारों सरकारी बीमा कंपनियों को पांच साल में स्वास्थ्य बीमा से 1.16 लाख करोड़ रुपये का प्रीमियम मिला है। इस दौरान निजी कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी में तेजी आई, जबकि सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी घट गई। कैग के ऑडिट में पता चला है कि मंत्रालय के दिशा-निर्देश का सरकारी बीमा कंपनियों द्वारा अनुपालन नहीं किया गया है।
रिपोर्ट 4 : कमी पर भी तटीय क्षेत्रों की परियोजनाओं को मंजूरी
कैग ने तटीय क्षेत्रों की परियोजनाओं से संबधित रिपोर्ट जारी की है। इसमें बताया है कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट की कमी के बावजूद 2015 से 2020 के दौरान तटीय विनियमन क्षेत्रों (सीआरजेड) में कई परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी। सरकार ने 2019 में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत तटीय और समुद्री क्षेत्रों के संरक्षण के लिए सीआरजेड मानदंडों को अधिसूचित किया था। कैग की रिपोर्ट के अनुसार, कई जगहों पर विचार-विमर्श के लिए मौजूद विशेषज्ञों के बिना ही पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति ने परियोजनाओं को मंजूरी दे दी।