ईरान युद्ध से बढ़े पश्चिम एशिया तनाव के बीच भारत ने ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से रिश्ते फिर मजबूत किए हैं। सस्ती और स्थिर आपूर्ति के लिए एलएनजी डील पर सहमति बनी है, जो यूक्रेन युद्ध के बाद पहली बड़ी पहल होगी। इससे अमेरिका की भारत-रूस दूरी बढ़ाने की कोशिशों को झटका लगा है।
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार को एक बड़ा झटका दिया है। हालांकि दूसरी ओर बढ़ते तनाव ने भारत को अपने पुराने दोस्त रूस से निकटता बढ़ाने का मौका भी दिया है। इसका एक आधार ये भी है कि इससे लंबे समय से भारत और रूस के बीच दूरी बढ़ाने की कोशिश कर रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इससे झटका लग सकता है। इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि तेल संकट से निपटने के लिए भारत ने एक बार फिर अपने पुराने सहयोगी रूस की ओर रुख तेज किया है। इतना ही नहीं सस्ती और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए नई दिल्ली और मॉस्को के बीच तेल और गैस सहयोग तेजी से गहराता दिख रहा है।
विज्ञापन
सूत्रों के मुताबिक, भारत और रूस के बीच तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की आपूर्ति फिर से शुरू करने पर सहमति बनी है। यह यूक्रेन युद्ध के बाद पहली बार होगा जब रूस सीधे भारत को एलएलजी बेच सकता है। इस पर अंतिम समझौता आने वाले हफ्तों में हो सकता है। बताया जा रहा है कि 19 मार्च को नई दिल्ली में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी और रूस के उप ऊर्जा मंत्री पावेल सोरोकिन के बीच हुई बैठक में इस दिशा में मौखिक सहमति बनी।
कच्चे तेल का आयात भी बढ़ेगा
भारत रूस से कच्चे तेल की खरीद भी तेजी से बढ़ाने की तैयारी में है। अनुमान है कि रूस से आने वाला तेल भारत के कुल आयात का 40% तक पहुंच सकता है, जो हाल के महीनों की तुलना में लगभग दोगुना होगा। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने भारी छूट पर तेल बेचा, जिसका भारत ने बड़ा फायदा उठाया था। पिछले साल भारत ने रूस से करीब 44 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा था।
अमेरिका से छूट की मांग
रूस से बढ़ते ऊर्जा व्यापार को लेकर भारत ने अमेरिका से संभावित प्रतिबंधों में छूट की मांग भी की है। गौरतलब है कि अमेरिकी प्रशासन लंबे समय से भारत पर रूसी ऊर्जा खरीद कम करने का दबाव बनाता रहा है।
रूस को मिला मौका
विशेषज्ञ मानते हैं कि मौजूदा हालात में रूस को भारत के साथ अपने संबंध और मजबूत करने का अवसर मिल गया है। हालांकि, नई एलएनजी डील पहले की तुलना में भारत के लिए कम फायदेमंद हो सकती है, क्योंकि मौजूदा समय सेलर का बाजार बन चुका है। रूस न सिर्फ ऊर्जा, बल्कि बिजली ट्रांसमिशन, बैंकिंग और हवाई कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में भी भारत के साथ सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।