देश में पहली बार अस्पतालों में मरीजों की सही देखभाल के लिए आंतरिक रेफरल दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य महानिदेशालय ने कहा है कि किसी भी मरीज को रेफर करने में देरी नहीं करनी चाहिए। इसका फैसला केवल जूनियर डॉक्टर पर निर्भर नहीं हो सकता है, क्योंकि इससे मरीजों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इतना ही नहीं केंद्र सरकार ने दिशानिर्देशों में डॉक्टरों के बीच कमजोर समन्वय पर चिंता जताई है।
स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. अतुल गर्ग का कहना है कि किसी भी अस्पताल में बेहतर स्वास्थ्य सेवा के लिए रेफरल प्रक्रिया एक अहम घटक है। अस्पताल आने वाले मरीजों में से कई सह-रुग्णता से ग्रस्त होते हैं। ऐसे में उनके लिए बहुअनुशासन वाली देखभाल की आवश्यकता होती है, लेकिन रेजिडेंट से लेकर वरिष्ठ डॉक्टर में विसंगतियां और विभागों के बीच आपसी खींचतान का असर साफ दिखाई देता है, जिसका सीधा असर मरीज पर पड़ता है। खराब समन्वय और संचार जैसी समस्याएं आम हैं। इसकी रोकथाम के लिए यह दिशानिर्देश जारी किए गए।
केवल मौखिक संचार पर न रहें निर्भर
दिशानिर्देशों में 10 बिंदुओं के जरिये अस्पतालों को बताया गया है कि रेफरल शुरू करते समय आवश्यक नैदानिक जानकारी या दस्तावेजीकरण को न छोड़ें। यह न मानें कि सभी रेफरल नियमित या गैर-जरूरी है, प्रत्येक रोगी की नैदानिक स्थिति का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करें। मरीजों के साथ संचार को नजरअंदाज न करें। केवल मौखिक संचार पर निर्भर न रहें। इस प्रक्रिया के लिए अपने वरिष्ठ सहकर्मियों या अस्पताल से सहायता लेने में संकोच न करें।