बीते 40 वर्षों में देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र के ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया है और अब विधानसभा चुनाव के नतीजों में कामयाबी हासिल करने के बाद वे अपनी दूसरी पारी के लिए तैयार हैं।
मुख्यमंत्री का पद पाने में फडणवीस के लिए पार्टी प्रमुख का पद बहुत अहम साबित हुआ। उनके ही नेतृत्व में भाजपा राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनी लेकिन यही एक मात्र कारण नहीं रहा। संघ की विचारधारा में ढले फडणवीस में आरएसएस बहुत विश्वास रखता है। इसके अलावा लोकसभा चुनाव 2014 में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा की केंद्र में सरकार बनी जो गडकरी के माकूल नहीं था।
अन्य राज्यों में भाजपा की रणनीति अल्पसंख्यक समुदाय से मुख्यमंत्री बनाने की रही न कि बहुसंख्यक वर्ग से। हरियाणा में गैर जाट मनोहरलाल खट्टर, झारखंड में गैरआदिवासी रघुबर दास और महाराष्ट्र में गैरमराठा देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाया गया। इसका फायदा यह हुआ कि महाराष्ट्र में भाजपा को गैर मराठाओं का समर्थन मिला।
मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद देवेंद्र फडणवीस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली को अपनाया। महाराष्ट्र के राजनीतिक इतिहास में बहुत कम ही राजनेता ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपना मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा किया हो। फडणवीस के सामने भी ऐसी संकट की स्थिति पैदा हुई लेकिन उन्होंने न केवल अंदरूणी प्रतिद्वंद्विता को काबू किया बल्कि गठबंधन की सहयोगी शिवसेना से उपजी प्रतिकूल परिस्थितियों का भी बखूबी सामना किया।
फडणवीस को अपनी पार्टी के अंदर ही प्रतिद्वंद्विता का सामना करना पड़ा। नितिन गडकरी, एकनाथ खड़से, पंकजा मुंडे, विनोद तावड़े और चंद्रकांत पाटील सरीखे नेताओं को फडणवीस का मुख्य प्रतिद्वंद्वी माना गया।
इनमें से गडकरी को केंद्र में अहम पद दिया गया ताकि स्वभाविक रूप से राज्य की राजनीति में उनका कद कम हो जाए। दूसरी तरफ, एकनाथ खड़से, पंकजा मुंडे और विनोद तावड़े जैसे नेताओं को राज्य में मंत्री का पद तो दिया गया लेकिन समय समय पर उनके सामने परेशानियां आती रहीं और वो विवादों में घिरते गए। खड़से पर भ्रष्टाचार का आरोप था, लिहाजा उन्हें अपना मंत्री पद खोना पड़ा। बाद में न तो उन्हें कभी कैबिनेट में नहीं लिया गया और न ही इस चुनाव में उन्हें टिकट ही दी गई।
विनोद तावड़े फर्जी डिग्री और स्कूल के लिए सामानों की ख़रीद में अनियमितता की वजह से मुश्किलों में पड़ गए। वहीं पंकजा मुंडे पर भी चिक्की ख़रीद मामले में आरोप लगा। इन सभी मामलों का सीधा राजनीतिक लाभ फडणवीस को मिला। उन्होंने कुछ वैकल्पिक नेताओं को मजबूत बनाया ताकि ऊपर बताए गए सभी नेताओं के लिए अब आगे आना मुश्किल हो। वे खड़से की जगह गिरीश महाजन को तो विनोद तावड़े की जगह आशीष शेलार को लाए।
लेकिन फडणवीस को अब भी चंद्रकांत पाटील से चुनौती मिल रही है। पाटील राज्य की कैबिनेट में नंबर दो पर हैं और केंद्रीय नेतृत्व से भी उनके अच्छे संबंध हैं। उन्हें अमित शाह के वफादार के रूप में जाना जाता है। उनके पास मराठा होने का लाभ भी है। लिहाजा, आने वाले वक्त में चंद्रकांत पाटील फडणवीस के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी होंगे। दूसरी ओर, खड़से और तावड़े के साथ जो हुआ उसे देखते हुए पार्टी के अंदर अन्य विरोधी एकजुट होकर फडणवीस के ख़िलाफ सामने आ सकते हैं।
इसके साथ ही फडणवीस को गठबंधन की सहयोगी शिवसेना से भी निपटना होगा। चूंकि भाजपा को राज्य विधानसभा में पूर्ण बहुमत नहीं हासिल हो सका है, लिहाजा उन्हें शिवसेना का साथ लेकर ही सरकार चलाना है। भले ही शिवसेना को उन्होंने मंत्रिमंडल में कोई ख़ास महत्वपूर्ण विभाग नहीं दिया लेकिन गठबंधन में उसे बनाए रखने में कामयाब रहे हैं।
मुंबई नगरपालिका चुनावों में भाजपा को मिली भारी सफलता इसका परिचायक है। कई ऐसी वजहें हैं जिससे वे शिवसेना को गठबंधन में बनाए रखने में कामयाब हुए और कम सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए राजी भी कर सके। इस बार उन्होंने शिवसेना को ज़रूर अपनी चतुराई से संभाल लिया है लेकिन अपने पिछले अनुभवों को देखते हुए शिवसेना इस बार ज़रूर दबाव की राजनीति का इस्तेमाल करेगी।
फडणवीस के सामने एक और बड़ी चुनौती महाराष्ट्र की राजनीति में मराठा वर्चस्व का सामना और इस समुदाया का समर्थन प्राप्त करना था। मराठा आरक्षण की मांग को लेकर वो सड़कों पर उतर गए और राज्य भर में बड़ी बड़ी रैलियों का आयोजन किया। इससे फडणवीस को परेशानियों का सामना करना पड़ सकता था लेकिन फडणवीस ने मराठा समुदाय को आरक्षण देने की घोषणा करके इस चुनौती को भी सफलतापूर्वक पार कर लिया।
कारवां मैग्जीन में देवेंद्र फडणवीस पर एक लेख लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अनोश मालेकर मराठा समुदाय से फडणवीस के रिश्तों का आकलन करते हुए कहते हैं, "मराठा वोटों में 1995 में ही विभाजन हो गया था। देवेंद्र फडणवीस सूझबूझ से सफलतापूर्वक अपने हक़ में इसका इस्तेमाल करते हुए मुख्यमंत्री के पद तक पहुंच गए।"
वे कहते हैं, "जब पृथ्वीराज चौहान ने मुख्यमंत्री का पद संभाला तो मराठा समुदाय के बीच दरार ने राजनीतिक रुख ले लिया और समुदाय के सदस्य कांग्रेस और एनसीपी के बीच विभाजित हो गए। 2014 में सत्ता में आने के बाद इस फडणवीस को इस विभाजन से लाभ मिला। 2010 और 2014 के दरम्यान कुछ मराठा नेताओं को अपने पक्ष में करने में कामयाब रहे।"
मालेकर इसके बाद कहते हैं, "भाजपा नेता टीवी के जरिए लोगों के सामने अपनी छवि बनाने में मामले में बहुत चतुर हैं। इसी रणनीति को अपनाते हुए 2016 में छत्रपति संभाजिराजे को भाजपा में लाया गया। नतीजतन, मराठा समुदाय के सदस्य जो अब तक सरकार के विरोध में खड़े थे, असमंजस में पड़ गए। इसके बाद भी कई मराठा नेताओं को भाजपा के पाले में लाकर उनके गुस्से को शांत किया गया।"
वे कहते हैं कि "फडणवीस का ख़ुफिया तंत्र भी बहुत मजबूत है। उन्हें इस बात की सही सही जानकारी मिल जाती है कि कौन उनका विरोध कर रहा है और पार्टी में दरार पैदा करने की कोशिश कर रहा है। वे किसान आंदोलन और मराठा आंदोलनों से ऐसे ही निबटे। लिहाजा अब तक कोई भी उनके ख़िलाफ पूरी तन्मयता से बड़े पैमाने पर खड़ा नहीं हो सका है।"
मालेकर कहते हैं कि, "भले ही फडणवीस ने मराठा आंदोलन या पार्टी की अंदरूणी समस्याओं से निबट लिया हो लेकिन पश्चिम महाराष्ट्र के मराठा नेताओं में असंतोष है। पार्टी को उसे निपटाना है। आमतौर पर चीनी और शिक्षा क्षेत्र के ये बड़े उद्योपति किसी की नहीं सुनते लिहाजा यह फडणवीस के सामने एक बड़ी चुनौती की तरह है।"
इसके अलावा फडणवीस के सामने अगले पांच वर्षों के दौरान नौकरियों के सृजन की समस्या भी विकराल होगी। मराठा आरक्षण पर तो मुहर लगा दी गई है लेकिन अब उनकी महत्वकांक्षा को पूरा करना फडणवीस के लिए बड़ी चुनौती होगी।
माना जाता है कि फडणवीस को मीडिया की अच्छी समझ है लेकिन अब यह भी सवाल उठा है कि क्या वे मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं?
हफिंगटन पोस्ट के पवन दहात कहते हैं, "देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री बनने से पहले और उसके बाद मीडिया का बहुत ही चतुराई से इस्तेमाल किया। सबसे महत्वपूर्ण बात, उन्होंने पत्रकारों के बीच अपने हमदर्द पैदा कर लिए हैं। उन्हें मुंबई में लश्कर-ए-देवेंद्र कहा जाता है। वे एक तरह से भाजपा के प्रवक्ताओं की तरह काम करते हैं। वे बहुत बेहतरीन तरीके से सरकार का समर्थन करते हैं। मीडिया के जरिए सरकार की सकारात्मक छवि कैसे बनाई जाए और नकारात्मक कवरेज से कैसे बचा जाए इसमें फडणवीस को महारथ हासिल है। हालांकि, मीडिया के लिए यह अच्छा नहीं है।"
वे कहते हैं, "मीडियाकर्मियों के इस्तेमाल की यह रणनीति उन्हें राजनीति में बहुत मदद पहुंचाती हैं। अगर मीडिया पर नियंत्रण है तो सही ख़बर लोगों तक कभी नहीं पहुंच सकतीं। उदाहरण के लिए सरकार कहती है कि उनके कार्यकाल में कोई घोटाला नहीं हुआ, भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं लगे। लेकिन बीते पांच वर्षों के दौरान सरकार पर कई आरोप लगे हैं। एकनाथ खडसे, प्रकाश मेहता को इन्हीं वजहों से मंत्री पद छोड़ना पड़ा। लेकिन मीडिया के प्रबंधन से सरकार की गैर-भ्रष्ट छवि बनाई गई।"
भले ही देवेंद्र फडणवीस अगले पांच वर्षों के लिए एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे जाएं लेकिन इस बार चुनौतियां और भी गंभीर हो सकती हैं। सबसे पहली चुनौती तो होगी मराठा युवाओं को रोज़गार देना। फिर राज्य में बेरोज़गारी की समस्या से निबटना होगा। सरकार को राज्य में आर्थिक सुस्ती से भी जूझना होगा। वहीं धनगर समुदाय को आरक्षण को लेकर भी कुछ फैसले करने होंगे। किसानों के बीच विश्वास पैदा करने के लिए उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी और इन सब पर अगले पांच वर्षों में नतीजे देने होंगे।
इसके अलावा कई अधूरी परियोजनाएं पूरी करनी होंगी और इन स भी चुनौतियों से पार पाने के लिए बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। इन सबके साथ उन्हें बढ़ी हुई ताक़त वाली शिवसेना के दबाव और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विरोध का सामना भी करना पड़ेगा।